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आखिर अमेठी क्यों आना पड़ा सोनिया को?

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कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को 16 साल बाद अमेठी के रण में क्यों उतरना पड़ा? शनिवार की रैली के बाद ये सवाल जहन में कौंध रहा है।
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लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की नैया पार लगाने की जिम्मेदारी राहुल गांधी को सौंपी गई है। सोनिया गांधी पिछले वर्ष उन्हें पार्टी उपाध्यक्ष पद सौंपने के बाद से ही पिछली सीट पर बैठ गई हैं।

लेकिन चुनाव में राहुल गांधी के प्रचार के लिए खुद सोनिया गांध खुद अमेठी जाना पड़ा। सोनिया ने रैली में राहुल के लिए भावुक अपील की। उन्होंने कहा, 'मैंने अमेठी को अपना बेटा दिया है, ख्याल रखना।'
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कांग्रेस का गढ़ रही है अमेठी

अमेठी लोकसभा सीट पारंपरिक रूप से कांग्रेस का गढ़ रही है। 1980 में संजय गांधी ने वहां से चुनाव लड़ा, और अमेठी में गांधी परिवार की दस्तक हुई। हालांकि उसी वर्ष संजय की मौत हो गई, जिसके बाद अमेठी की जनता ने राजीव गांधी को अपना प्रतिनिधि चुना।

1998-99 में डॉ संजय सिंह की जीत को छोड़ दिया जाए, तो ये सीट कांग्रेस के खाते में ही रही। संजय सिंह, संजय गांधी के पुराने सहयोगी और गांधी परिवार के करी‌बियों में हैं, लेकिन उस वर्ष उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था।

हांलाकि बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए। इस बार उनकी पत्नी अमिता सिंह कांग्रेस के टिकट पर अमेठी की पड़ोसी सीट सुल्तानपुर से चुनाव लड़ रही हैं।

राहुल तीसरी बार लड़ रहे लोकसभा चुनाव

1999 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने अमेठी को अपना रणक्षेत्र बनाया था। हालांकि 2004 में उन्होंने ये सीट अपने बेटे राहुल गांधी को सौंप दी।

राहुल यहां तीसरी बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन पिछले दो चुनावों की तुलना में इस बार आम आदमी पार्टी नेता कुमार विश्वास और भारतीय जनता पार्टी की नेता स्मृति मल्होत्रा की मौजूदगी के कारण ये चुनाव राहुल के लिए कठिन माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो सोनिया की रैली के बाद के इस आशंका को अधिक बल मिला है कि राहुल इस बार एक कठिन चुनाव लड़ रहे हैं।
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खुद सोनिया भी बनीं राहुल के लिए चुनौती

‌माना जा रहा है कि अमेठी में खुद सोनिया गांधी ही राहुल गांधी के लिए चुनौती बन गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अमेठी की तुलना में सोनिया गांधी की सीट राय बरेली में पिछले 10 सालों में बहुत विकास कार्य हुआ है।

रायबरेली में पिछले 10 वर्ष रेल कोच कारखाना और राष्ट्रीय स्तर के कई शिक्षण संस्‍थान खुले हैं, जिसके बाद रोजगार के पर्याप्त अवसर वहां पैदा हुए है। जबकि अमेठी अब भी प‌िछडा़ है।

सोनिया की तुलना में राहुल अपने क्षेत्र में विकास कार्य कराने के कमतर साबित हुए हैं। कुमार विश्वास की सघन कैम्पेनिंग ने इस मान्यता को और मजबूत किया है। ऐसे में अमेठी फतह राहुल के लिए इस बार आसान नहीं मानी जा रही है।
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