सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि बच्चों की गुमशुदगी की शिकायत पर पुलिस हर हाल में एफआईआर दर्ज करे। राज्य सरकारों के मुख्य सचिवों को आदेश जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश हर पुलिस थाने में भेजने को कहा है। साथ ही देश के सभी पुलिस थानों में जूवनाइल मामलों की देखरेख के लिए विशेष अधिकारियों की नियुक्ति किए जाने का आदेश दिया।
चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि किशोरों से जुड़े मामलों को देखने के लिए हर जिले में प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों की यूनिट गठित की जाए। ताकि उनके साथ अन्य आरोपियों जैसा सुलूक न हो। इन अधिकारियों को सादे कपड़ों में होना चाहिए और बाल कल्याण समितियों से सहयोग लेकर काम करना चाहिए।
पीठ ने बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट न लिखे जाने की शिकायत पर नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस को बच्चों की गुमशुदगी की हर शिकायत को दर्ज करना चाहिए। इसके अलावा हर मामले में समुचित जांच होनी चाहिए। बच्चों के लापता होने की शिकायत में कोई लापरवाही नहीं बरती जानी चाहिए।
पीठ ने यह आदेश एनजीओ बचपन बचाओ आंदोलन की ओर से दायर उस जनहित याचिका पर जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया है कि जनवरी 2008-2010 के दौरान देश में 1.7 लाख से भी ज्यादा बच्चे लापता हुए। एनजीओ का दावा है कि गायब हुए बच्चों की तस्करी की गई या फिर उन्हें बाल मजदूरी में लगा दिया गया।
सर्वोच्च अदालत ने एनजीओ की याचिका पर पिछले साल 16 मार्च को केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर लापता बच्चों के मुद्दे पर जवाब मांगा था, लेकिन आंध्र प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु जवाब दाखिल करने में नाकाम रहे। पीठ ने इन राज्यों को अंतिम मौका प्रदान करते हुए पांच फरवरी तक जवाब दाखिल करने को कहा है। साथ ही यह साफ कर दिया है कि विफल रहने पर राज्य के मुख्य सचिव को अदालत के समक्ष पेश होना पड़ेगा।
पीठ के समक्ष एनजीओ के अधिवक्ता एचएस फुल्का ने कहा कि शीर्षस्थ अदालत को केंद्र और राज्य को लापता बच्चों के मामलों में राष्ट्रीय योजना बनाकर इस बुराई से निपटने का आदेश देना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े पेश करते हुए कहा कि जनवरी, 2008 से जनवरी, 2010 तक 1.7 लाख बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट देश के 392 जिलों में दर्ज हुई और इनमें से 41546 बच्चों को पुलिस नहीं खोज पाई है।