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इस बार बैंगलुरू से उठा हिंदी विरोध!

Sun, 23 Aug 2015 09:16 PM IST
अपूर्वानंद / विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
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हिंदी थोपना बंद करो!' पंद्रह अगस्त के दिन प्रधानमंत्री का लाल किले का भाषण समाप्त होते ही ट्विटर पर यह अभियान-सा छिड़ गया। ध्यान रहे, शुरुआत बैंगलुरू से हुई, चेन्नै से नहीं।
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और फिर यह अलग-अलग जगह ज़ोर पकड़ गया।क्या इस बार शक इसलिए बढ़ गया कि 'हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान' वाले केंद्र में गद्दीनशीन हो गए हैं! इसलिए चेन्नै नहीं, कॉस्मोपॉलिटन बैंगलुरू से यह नारा उठा!

चेन्नै इसलिए कहा कि हिंदी-विरोध की ज़मीन वही रही है. 1960 के दशक में तमिलनाडु में हिंदी-विरोधी आंदोलन की याद अभी है। तमिलनाडु में तमिल अस्मिता की राजनीति करनी हो तो दो चीज़ें काम आती हैं- श्रीलंका के तमिल और दूसरी हिंदी।लेकिन अब तमिलनाडु के हिंदी विरोध का जोश हल्का हो चला है।
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अपनी मर्जी से सीख रहे हैं हिंदी

तमिल अपनी मर्ज़ी से हिंदी सीख रहे हैं, यानी जैसे कोई भी भाषा सीखी जाती है।हिंदी भारत में लेकिन किसी भी भाषा की तरह नहीं है। तमिल, मलयालम, ओड़िया, संथाली, बोडो, कन्नड़, मैथिली, उर्दू ,सबके मुकाबले यह कहीं नई जुबान है।

लेकिन खड़ी बोली का सहारा लेकर पनपी इस भाषा को उन्नीसवीं सदी के बाद से बड़ी मुहब्बत और जज़्बे के साथ क्या उत्तर, क्या पूरब, क्या पश्चिम और क्या दक्षिण, हर जगह अपनाया गया।

कन्नड़ रंगकर्मी बीवी कारंथ ने एक बार बताया, "हमारे समय में हिंदी प्रचारकों का इतना ग्लैमर था कि उनके साथ लड़कियां भाग जाया करती थीं।"राजा राजगोपालाचारी भी हिंदी के प्रचारक थे. लेकिन आज़ादी के आंदोलन में जो सहज था, वह आज़ादी मिलते ही उतना ही नागवार हो उठा।

कभी हिंदी के वकील रहे राजाजी तमिलनाडु में हिंदी-विरोध अगुवाई करने लगे.हिंदी वालों को यह सब बुरा लगता है।आख़िर भारत राष्ट्र एक सूत्र कैसे बँधेगा? लेकिन वे भूल जाते हैं कि भारत बहुभाषी राष्ट्र है।अगर सबको इसका बनना है तो वे इस राष्ट्र को भी अपनी भाषा में ही सुनना चाहते हैं।

अपने गिरेबां में देखे

वह दिन कभी आएगा जब लालकिले से तमिल या संथाली में उद्बोधन होगा और हिंदीवाले उसका अनुवाद सुनेंगे। फिर उन्हें इस शिकायत का मर्म समझ में आएगा कि क्यों 'राष्ट्रीय' सम्बोधन का अनुवाद हर भारतीय भाषा में होना ज़रूरी है।

साधन की कमी का बहाना लचर है. राष्ट्र निर्माण के लिए यह कीमत थोड़ी है. योग दिवस के खर्चे से कम में ही हो जाएगा यह! यह अटपटी बात है कि बैंगलुरू प्लेटफार्म पर सूचनाएँ हिंदी, अंग्रेज़ी में तो हों, कन्नड़ में नहीं।

उसी तरह क्यों नहीं सारी केंद्रीय सूचनाएं या परिपत्र सभी भाषाओं में मुहैया कराए जाएँ!हिंदी सीखने की नसीहत अन्य भाषा भाषियों को जो देते हैं वे अपने गिरेबान में झाँक कर देखें।

हिंदी वालों ने गला घोटा

औसत दक्षिण भारतीय चार भाषाएँ अलग-अलग दक्षता के साथ इस्तेमाल कर सकता है. हिंदीवाले एक लड़खड़ाती हुई हिंदी का परचम लेकर हिंद सर करने का ख़्वाब देखते हैं।

अपने इलाके की ही ज़ुबान उर्दू का जिस कदर हिंदीवालों ने गला घोंटा, उसकी कहानी ठीक से कही नहीं गई है।हिंदी के नागार्जुन लेकिन मैथिली के यात्री ने कभी हिंदी के युवकोचित दंभ की कड़ी भर्त्सना की थी, "जवान हिंदी बूढ़ी मैथिली की पीठ पर हुमचकर लात मारेगी!"

त्रिभाषा सूत्र के साथ धोखाधड़ी इसी इलाके में हुई. हिंदी राष्ट्र भाषा है, यह नारा सुन-सुनकर दूसरी भाषाओं के मन में शक पैदा हुआ।
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हिंदी विलाप

हर सितंबर हिंदी-विलाप और व्यर्थ के हिंदी-शौर्यगान का महीना होता है। नहीं सोचते हैं लोग तो यह कि क्यों हिंदी में अकादमिक सामग्री तैयार करने को साधन नहीं हैं!

क्यों भारतीय भाषाओं को ये साधन नहीं मिलते! हिंदी सारी भारतीय भाषाओं की बराबरी में उन्हीं की बिरादरी की एक सदस्य रह कर स्वीकृति पा सकती है।राज के कंधे पर चढ़ कर वह इठला भले ले, दूसरों का अपनापा उसे मिलने से रहा।
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