तूफान जा चुका है लेकिन उसके कदमों के निशान चारों तरफ देखे जा सकते हैं।
टूटे हुए टेलीफोन और बिजली के खंभे, घरों, स्कूलों इत्यादि की टूटी हूई दीवारें और कांच। सड़कों और गलियों में बिखरे हुए तूफ़ान में उखड़े पेड़। जिधर नजर जाती है उधर तूफ़ान का कहर दिखाई पड़ता है।
यातायात के सार्वजनिक साधन पूरी तरह ठप्प पड़े हैं। खाने-पीने के सभी होटल-ढाबे बंद हैं। दुर्गापूजा के लिए बनाए गए सारे टेंट और पंडाल उजड़ गए हैं।
इलाके के सभी रिहाइशी होटल बंद हैं। हम जिस होटल में रुके हैं उसमें भी काफी क्षति हुई है। खिड़कियों दरवाजों के काँच टूट गए हैं।
बिजली तो कल सुबह से ही गायब है। गोपालपुर और भुवनेश्वर मार्ग पर लंबा जाम लगा हुआ है।
इस तूफ़ान में गंजम ज़िला सर्वाधिक प्रभावित हुआ। हरीपुर, वेंकटपुर, बांदर जैसे इलाके तूफ़ान से ज़्यादा प्रभावित हुए हैं।
लोग ख़ुद को खुशकिस्मत मान रहे हैं कि फिलहाल यहाँ बारिश रुकी हुई है।
ओडिशा का यह इलाका युद्द के बाद बर्बाद हुए शहर जैसा दिख रहा है। लोगों के चेहरे पर तूफ़ान के बाद आने वाली अवसाद हावी है।
आम लोग सुबह तड़के ही तूफ़ान से हुए नुकसान का अंदाजा लगाना शुरू कर दिया।
जिन घरों की छप्परें उड़ गईं, जिनके मालो-असबाब बिखर गए हैं वो उन्हें एक-एक कर बीनने की कोशिश करते देखे गए। आख़िरकार तूफ़ान के बाद भी ज़िंदगी रुकती नहीं।
ओडिशा की समुद्र तट के इलाकों से करीब डेढ़ लाख लोगों को हटाया गया है। गोपालपुर में एनडीआरएफ की टीम राहत कार्य कर रही है।
समुद्र तट के बेहद करीब रहने वाले 1000 लोग स्थानीय शिविर में रखे गए हैं।
अपुष्ट ख़बरों के अनुसार छह लोगों की मृत्यु हुई है।
जो लोग बचे हैं उनके लिए भी अगले कुछ समय तक की जिंदगी की जद्दोजहद जारी रहेगी।
पुराना मुहावरा है, 'तूफ़ान के बाद का पसरा सन्नाटा'। यह सन्नाटा कितना भयावह हो सकता है इसे इस वक़्त ओडिशा में महसूस किया जा सकता है।