स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह पर हत्या के केस के खिलाफ पाकिस्तान की लाहौर हाईकोर्ट में उन्हें निर्दोष साबित करने के लिए फुल बैंच के समक्ष सुनवाई के लिए याचिका दायर की गई है। इस याचिका को भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के चेयरमैन इम्पियाज राशिद कुरैशी ने दायर की है, जो पेशे से वकील हैं।
कुरैशी ने अपनी याचिका में कहा है कि पहले भगत सिंह को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, लेकिन बाद में उस सजा को कुछ अन्य केसों के तहत मौत की सजा में बदल दिया गया।
याचिका में कहा गया है कि आज भी भगत सिंह को एक स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान दिया जाता है। ऐसा न केवल सिख समुदाय में होता है, बल्कि मुस्लिम समुदाय में भी होता है। ऐसे में भगत सिंह का यह मुद्दा देश का मुद्दा है, जिसे फुल बेंच के जल्द से जल्द सुलझा देना चाहिए।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के खिलाफ ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर जॉन पी सौंडर्स की हत्या का केस दर्ज किया गया था। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी के फंदे पर लटका दिया था।
FIR में भगत सिंह का नाम नहीं
इस केस पर आखिरी बार मई 2013 में सुनवाई की गई थी। पिछले ही साल लाहौर पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर एफआईआर की एक कॉपी याचिकाकर्ता को दी थी। यह एफआईआर 1928 में मारे गए सौंडर्स की हत्या के बाद दर्ज की गई थी।
जिस एफआईआर के तहत भगत सिंह को सिर्फ 23 साल की उम्र में ही 1931 में फांसी पर लटका दिया गया था, उस एफआईआर में भगत सिंह का नाम ही नहीं है।
भगत सिंह की मौत के 83 साल बाद लाहौर पुलिस ने अनारकली पुलिस स्टेशन के रिकॉर्ड खंगाले और इस एफआईआर को ढूंढ़ निकाला है। यह एफआईआर 17 दिसंबर 1928 को शाम 4.30 बजे अनारकली पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी, जो उर्दू में लिखी है।
'अज्ञात लोगों' के खिलाफ एफआईआर
एफआईआर के अनुसार दो 'अज्ञात लोगों' ने सौंडर्स की हत्या की थी। एफआईआर में कहीं भी भगत सिंह के नाम का उल्लेख नहीं है, जो भगत सिंह को निर्दोष साबित करता है।
यह केस आईपीसी की धारा 302, 1201 और 109 के तहत दर्ज किया था। कुरैशी ने कहा कि भगत सिंह को 450 गवाहों की बात सुने बगैर ही मौत की सजा सुना दी गई। कुरैशी ने कहा कि वह सौंडर्स की हत्या के केस में भगत सिंह को निर्दोष साबित कर के रहेंगे।