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पठानकोट हमला: पर्रिकर पर बरसा पाक मीडिया

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पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के इस बयान की आलोचना हो रही है कि पाकिस्तानी जांच टीम को पठानकोट जाने की इजाजत नहीं दी जाएगी। 'एक्सप्रेस' के संपादकीय का शीर्षक है- पठानकोट हमला केस और भारत का नकारात्मक रवैया। अखबार लिखता है कि भारतीय रक्षा मंत्री ने वही पुरानी रट दोहराते हुए कहा कि पाकिस्तानी जांच टीम को पठानकोट एयरबेस का दौरा करने की अनुमति नहीं होगी, बल्कि भारत खुद पाकिस्तान को सबूत सौंपेगा, वो उनके मुताबिक कार्रवाई करता जाए।
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पठानकोट हमले की जांच में पाकिस्तान की तरफ से हर तरह के सहयोग का दावा करते हुए अखबार लिखता है कि गुजरांवाला में एक एफआईआर भी दर्ज हुई। अखबार के मुताबिक पहली बार दुश्मन सरजमीन पर घटी घटना के लिए पाकिस्तान में केस दर्ज किया गया है, लेकिन भारत सहयोग नहीं कर रहा है ताकि घटनास्थल का मुआयना कर सभी तथ्यों की पड़ताल हो सके।

'नवा-ए-वक़्त' लिखता है कि जब भारत 'हमारी जांच टीम को पठानकोट एयरबेस में जाने ही नहीं दे रहा है तो फिर साझा जांच टीम के प्रमुख को भारत जाने की जरूरत क्या है।' अखबार कहता है कि पठानकोट हमले के सिलसिले में भारत के रवैये से यही संकेत मिलता है कि वो पाकिस्तान को दबाव में रखने और उसके साथ बातचीत के सभी दरवाजे बंद करने की ठान चुका है।
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भारत के पाले में गेंद

अखबार ने इस मुद्दे पर पाकिस्तानी हुकमरानों की भी आलोचना की है जो उसके मुताबिक भारत के सामने रक्षात्मक मुद्रा में रहते हैं। 'औसाफ' लिखता है कि भारत अपने यहां हर घटना के बाद पाकिस्तान को दबाव में रखता है लेकिन पाकिस्तान कभी ऐसी प्रभावी कूटनीति से काम नहीं लेता, जैसी होना चाहिए। अखबार लिखता है कि सारी दुनिया जानती है कि समझौता एक्सप्रेस धमाका एक दहशतगर्द हमला था और पाकिस्तान ने बार-बार इसकी जांच के नतीजों से अवगत कराने को कहा था लेकिन भारतीय लीडरों ने कभी अपने वादे को पूरा नहीं किया।

अखबार कहता है कि भारत में कोई भी घटना हो, हर बार उंगली पाकिस्तान पर उठा दी जाती है लेकिन उसकी चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया जाता और पठानकोट हमले के सिलसिले में भी ऐसा ही हो रहा है। वहीं रोजनामा 'पाकिस्तान' ने टी-20 वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तानी टीम को भारत भेजने की अनुमति देने के फैसले का स्वागत किया है।

अखबार लिखता है कि भारत ने तो यूएई में तयशुदा सिरीज के अलावा क्रिकेट रिश्ते बहाल करने के लिए मिनी सिरीज खेलने से भी इनकार कर दिया तो अंदेशा था कि कहीं पाकिस्तान की तरफ से भी इनकार ही न कर दिया जाए। अखबार लिखता है कि पाकिस्तान सरकार ने एक अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट से हटने की बजाय गेंद को भारत के पाले में फेंक दिया है कि वो पाकिस्तानी टीम और पाकिस्तानी दर्शकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने के साथ-साथ उन्हें वीजा भी दे ताकि वो मैच देखने जा सकें।

चरमपंथी वारदातों में आई कमी

उधर 'दुनिया' लिखता है कि सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ ने उत्तरी वजीरिस्तान में चरमपंथियों के खिलाफ जारी ऑपरेशन जर्बे-अज़्ब का आखिरी चरण शुरू करने की हिदायत दी है। अखबार लिखता है कि इस ऑपरेशन के कारण चरमपंथी वारदातों में कमी आई है और आखिरी चरण दहशतगर्दी के ताबूत में आखिरी कील होगा। लेकिन अखबार ये भी कहता है कि ये मामला इतना आसान भी नहीं जितना समझा जा रहा है क्योंकि दूसरा चरण पहले चरण से ज्यादा मुश्किल, लंबा और संयम की परीक्षा लेना वाला होगा।

अखबार कहता है कि पहले चरण में तो 'दुश्मन हमारे सामने था और लक्ष्य साफ था लेकिन आखिरी चरण में हमें अपने बीच छिपे गद्दारों की पहचान करनी होगी और उन्हें खत्म करना होगा।' रुख भारत का करें तो पिछले दिनों में संसद में दिए अपने भाषण से सुर्खियों में आईं मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरान पर रोजनामा 'खबरें' का संपादकीय है- अदाकार नेता।

अखबार लिखता है न सिर्फ भाजपा के कार्यकर्ता और समर्थक स्मृति ईरानी को देवी दुर्गा का रूप बता रहे हैं बल्कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी उनके पूरे भाषण को शेयर किया है। लेकिन अखबार कहता है कि रोहित वेमुला पर होने वाली बहस में उनका भाषण अगर सच पर आधारित होता तो वाकई इतिहास में दर्ज होता, लेकिन जिस तरह से उन्होंने झूठ पर पर्दा डालने की कोशिश की, वो वाकई अफसोसनाक है।
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हरियाणा रेपकांड का भी मुद्दा उठाया

अखबार कहता है कि राज्यसभा के जरिए संसद में आने वाले कलाकार बहुत दिनों तक समझ ही नहीं पाते हैं कि क्या करें, लेकिन जब पार्टी की तरफ से स्क्रिप्ट थमा दी जाती हैं तो फिर वो उसके मुताबिक अपनी अदाकारी का जलवा दिखाने लगते हैं। उधर 'हिंदोस्तान एक्सप्रेस' ने अपने संपादकीय में हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान कथित तौर पर सामूहिक बलात्कारों के मुद्दे को उठाया है।

अखबार लिखता है कि मुरथल इलाके में 10 महिलाओं के सामूहिक बलात्कार के मामले में हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है और सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अखबार लिखता है कि हाल के सालों में एक चलन बन गया है कि लोग अपनी मांगों के साथ सड़क पर उतरते हैं और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं।

इतना ही नहीं इसके बाद सरकार उनकी बातें मान लेती है। अखबार कहता है कि ये चलन रुकना चाहिए और ऐसे लोगों से सख़्ती से निपटना चाहिए ताकि तोड़फोड़ और आगजनी का सिलसिला रुके।
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