उत्तर प्रदेश सरकार को डिग्री कॉलेज में पढ़ाने वाले अंशकालिक अध्यापकों की सेवाओं के लिए कम से कम उतना न्यूनतम वेतन देना होगा, जितना कि नियमित अध्यापकों को वेतनमान के आधार पर दिया जाता है। सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार की याचिका को खारिज करते हुए अंशकालिक अध्यापकों के वेतन के मुद्दे पर हाईकोर्ट के आदेश को जारी रखा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने प्रदेश सरकार को अंशकालिक अध्यापकों को नियमित वेतनमान का न्यूनतम वेतन देने का फैसला दिया था।
जस्टिस डीके जैन व जस्टिस मदन बी.लोकुर की पीठ ने राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अधिवक्ता से कहा कि हाईकोर्ट का आदेश उचित है। अदालत को इस मामले में हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं महसूस हो रही है। इसलिए पीठ प्रदेश सरकार की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका को खारिज करती है।
यूपी सरकार ने गत वर्ष 23 फरवरी को अध्यापिका डॉ. तमन्ना की याचिका पर जारी किए गए हाईकोर्ट के आदेश को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर 2010 में जारी किए अपने एक आदेश का हवाला देते हुए स्पष्ट किया अंशकालिक अध्यापकों को नियमित अध्यापकों को प्रदान किए जाने वाले वेतनमान का न्यूनतम वेतनमान दिया जाना चाहिए।
सर्वोच्च अदालत ने प्रदेश के डिग्री कॉलेजों में सेवाएं देने वाले अंशकालिक अध्यापकों को बड़ी राहत प्रदान करते हुए हाईकोर्ट के इस आदेश को जारी रखा। मालूम हो कि इस मुद्दे पर गत दो दशकों से कई मामलों में हाईकोर्ट यह साफ कर चुका था कि अंशकालिक अध्यापकों को नियमित वेतनमान का न्यूनतम वेतन दिया जाना चाहिए और उनकी सेवाओं को ध्यान में रखते हुए नियमितीकरण पर विचार किया जाना चाहिए।
सन् 1999 में उच्च शिक्षा युवा कल्याण समिति ने भी इस मसले पर राज्य सरकार के खिलाफ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। तब हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई राज्य सरकार ने अपनी याचिका वापस ले ली थी।