भारत और पाकिस्तान को साझा तौर पर शांति का नोबेल मिलना हफ्ते की एक बडी खबर रही, लेकिन दोनों देशों के उर्दू मीडिया में सरहद पर जारी तनाव छाया है।
पाकिस्तानी अखबार इंसाफ का संपादकीय है-दुश्मनों के खिलाफ एकता और सहमति की जरूरत।
अखबार ने एक तरफ भारत-पाक सीमा पर गोलाबारी में 13 पाकिस्तानियों के मारे जाने की बात की है तो कबायली इलाकों में ईद की छुट्टियों के दौरान अमरीकी ड्रोन हमलों में 18 लोगों की मौत का मुद्दा भी उठाया है।
अखबार कहता है कि अमरीका और भारत पाकिस्तान की जंगी क्षमताओं को परखना चाहते हैं। ऐसे में अगर उसके खिलाफ युद्ध शुरू किया गया तो परमाणु शक्ति के इस्तेमाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नवाए वक्त ने लिखा है कि मोदी और उनके रक्षा मंत्री पाकिस्तान पर दहाड रहे हैं लेकिन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पूरी तरह खामोश हैं।
ललकारते हैं पाकिस्तान के अखबार
अखबार ने जहां भारत को 'मुंह तोड जवाब देने' के लिए पाकिस्तानी फौज की तारीफ की है वहीं सरकार को भारत से हर तरह के संपर्क तोडने की नसीहत दी है।
रोजनामा वक्त ने पाकिस्तान पर संघर्षविराम के उल्लंघन के भारत के आरोपों पर लिखा है- उल्टा चोर कोतवाल को डांटे।
अखबार कहता है कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की जिम्मेदारी बनती है कि वो भारत को रोके, वरना भारत को ही इसके प्रत्याशित नतीजे भुगतने पड सकते हैं।
औसाफ ने अपने संपादकीय में खुले तौर पर भारत को युद्ध की चेतावनी दी गई है और शीर्षक दिया है –मोदी जिस स्तर पर चाहे जंग करके देख लें, वहीं दैनिक उम्मत का संपादकीय भारत भारी तबाही को दावत न दे।
रंग लाती है मेहनत
जंग ने मलाला यूसुफजई को नोबेल मिलने को पाकिस्तान के लिए राष्ट्रीय गौरव बताया है।
अखबार कहता है कि 17 साल की मलाला को इतनी छोटी उम्र में नोबेल मिलना साबित करता है कि बदतरीन हालात में भी मेहनत और नाइंसाफियों के खिलाफ संघर्ष जरूर रंग लाता है।
रोजनामा एक्सप्रेस लिखता है कि ये सही है कि पाकिस्तान में एक ऐसा वर्ग है जो मलाला की आलोचना करता है, लेकिन ज्यादातर लोग मलाला को पसंद करते हैं और लडकियों को शिक्षा देने की उनकी मुहिम के समर्थक हैं।
रुख भारत का करें तो मलाला के साथ साझा तौर पर नोबेल जीतने वाले कैलाश सत्यार्थी सभी अखबारों के पहले पन्ने पर मुस्कराते नजर आए, लेकिन यहां भी ज्यादा चर्चा सीमा पर तनाव की है।
हिंदोस्तान एक्सप्रेस ने सीमा पर तनाव के लिए पाकिस्तान की तरफ से गोलाबारी को जिम्मेदार बताया है और इसके चलते सरहद के पास रहने वाले लोगों की मुश्किलों का जिक्र किया है।
अखबार कहता है कि पाकिस्तान में सरकार कुछ सोचती है तो फौज कुछ और जबकि आईएसआई का कुछ तीसरा ही गेम प्लान होता है।
अखबार कहता है कि संघर्षविराम का उल्लंघन कर घुसपैठ कराना पाकिस्तान की पुराना तरीका है।
वहीं हमारा समाज कहता है कि पहले भी ऐसा कई बार हुआ है जब पाकिस्तान की सरकार भारत के साथ दोस्ती का हाथ बढाने की कोशिश करती है तो वहां की सरकार सरहद पर अमानवीय कार्रवाइयों को अंजाम देती है।