मनरेगा में गरीबों को सौ दिन के रोजगार की गारंटी का दावा तो किया गया लेकिन काम औसतन चार दिन ही दिए गए। सत्तर प्रतिशत गरीब काम से वंचित रहे।
देश भर में गरीबों की दशा बदलने के नाम पर सलाना 34 हजार करोड़ रुपये खर्च कर भी गरीबों के बदहाली दूर नहीं की जा सकी। केंद्र सरकार की संस्था नेशनल काउंसिल ऑफ एपलाइड इकॉनोमिक रिसर्च और यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड के सर्वे में यह चौंकाने वाला सच सामने आया है।
यह देशभर अपने तरीके का अकेला सबसे बड़ा सर्वे है जिसमें 1503 गांवों के 26 हजार ग्रामीणों से बातचीत कर तथ्य जुटाए गए हैं। सर्वे में जिन गरीबों से 2004-05 में बात की गई थी, उन्हीं से फिर दोबारा बातचीत कर उनकी हालत में आए बदलाव को जानने की कोशिश की गई।
यूनाइटेड नेशनस डेवलपमेंट प्रोग्राम के कंट्री डायरेक्टर, नीति आयोग के सदस्य विवेक देबराय, ग्रामीण विकास मंत्रालय के सचिव महापात्रा और अतिरिक्त सचिव अमरजीत सिन्हा आदि वरिष्ठ अधिकारियों को संस्था ने रिपोर्ट सौंप दी है।
सर्वे से खुलासा
सर्वे रिपोर्ट कहती है कि बहुप्रचारित ताम-झाम वाली योजना से अधिकांश गरीबों को कोई फायदा नहीं हुआ है। योजना की शुरुआत में जिन लोगों से बातचीत की गई थी उनमें से सिर्फ 25 प्रतिशत गरीब ही दोबारा सर्वे में मनरेगा में काम करते पाए गए।
ग्रामीण रोजगार पर सतही तौर पर मनरेगा का असर नहीं दिखा। रोजगार के दिनों में भी कोई बढ़ोतरी नहीं पाई गई। योजना की सबसे अच्छी हालत 2010-11 में रही जब 51 प्रतिशत निर्धारित काम पूरे हुए।
रिपोर्ट कहती है कि एक काम को पूरा किए बगैर नए प्रोजेक्ट शुरू कर दिए गए। नतीजतन दोनों तरह के प्रोजेक्ट अधूरे रहे। देशभर में मनरेगा में तय योजनाओं का 50 प्रतिशत भी पूरा नहीं किया जा सका।
जरुरतमंदों को काम नहीं दिए गए
गरीबों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि काम की मांग थी लेकिन जरुरतमंदों को काम नहीं दिए गए। प्रबंधन में अनेक खामियां पाईं गईं जिसकी वजह से गरीबों को फायदा नहीं मिल सका।
प्रबंधन की ओर से गरीबों को कहा जाता रहा कि काम उपलब्ध नहीं हैं। 15 से 59 साल के 13 प्रतिशत पुरुषों और 10 प्रतिशत महिलाओं को ही काम मिल सका। मजदूर बाजार को भी योजना प्रभावित नहीं कर पाई।
बिहार और उड़ीसा जैसे गरीब राज्यों में योजना की हालत सबसे खराब पाई गई। जिन्हें काम मिला उनके दिन बदले मनरेगा में जिन लोगों को काम मिला उनकी हालत पहले की तुलना में सुधरी। साहूकारों से कर्ज लेने वाले लोगों का प्रतिशत 48 से घटकर 27 पर आ गया। कम उत्पादक काम करने वालों की आमदनी बढ़ी।
इन समूह में बाल मजदूरी खत्म हुई और बच्चों की पढ़ाई का प्रतिशत बढ़ गया। जिन महिलाओं को काम मिला उनमें से 45 फीसदी की आमदनी पहले शून्य थी।