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...वरना हथियार उठा लेंगे किसान

Tue, 06 Nov 2012 11:23 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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भूमि अधिग्रहण पर निजामों की हिटलरशाही पर नाराज सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कानून को ताक पर रखकर किसानों को खेती के अधिकार से वंचित किया जाना हथियार उठाने के लिए मजबूर करना है।
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महाराष्ट्र के एक किसान को पचास वर्ष के बाद भी मुआवजा न दिए जाने के मामले में सर्वोच्च अदालत ने यह टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि औद्योगिक विकास के नाम पर किसी को संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता। यदि किसानों से खेती का हक गलत तरीके से छीना गया तो वह हथियार उठा लेगा।

जस्टिस बीएस चौहान और जस्टिस जगदीश सिंह खेहर की पीठ ने तुकाराम कना जोशी की याचिका पर महाराष्ट्र सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। पीठ ने इस मामले में सरकार के साथ हाईकोर्ट को भी फटकार लगाई है। पीठ ने कहा कि जहां एक गरीब अनपढ़ किसान को संवैधानिक अधिकार से वंचित कर दिया गया हो, ऐसे मामले को हाईकोर्ट ने देरी से याचिका दायर किए जाने के आधार पर खारिज कर इंसाफ को कुचल दिया।
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तयशुदा अवधि में याचिका दायर करने का प्रावधान सर्विस आदि के मामलों में इस्तेमाल होता है। भूमि अधिग्रहण के इस मामले में याचिका पर गंभीरता से सुनवाई की जानी चाहिए थी। किसान की जीविका छीनना उसके मानवाधिकार का हनन है। मालूम हो कि वर्ष, 2009 में किसान ने बांबे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन देरी से याचिका दायर होने पर हाईकोर्ट ने किसान की फरियाद नहीं सुनी।

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी नागरिक की जमीन पर सरकार के कब्जे को अतिक्रमण ही कहा जाएगा। यह अधिकारों का दुरुपयोग है। सरकार ने बाहुबल का इस्तेमाल करके उस ग्रामीण से उसकी जमीन छीन ली जो अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं था। अफसोस की बात यह है कि देश के सर्वाधिक संपन्न राज्य में यह हुआ। सरकार ने मध्यकालीन युग की याद दिला दी।

किसान को भारतीय संविधान के तहत नागरिक नहीं समझा गया। इस तरह का भेदभाव भ्रष्टाचार को जन्म देता है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को संबंधित जमीन का मुआवजा मौजूदा बाजार दर पर दिए जाने का आदेश दिया है। साथ ही एक महीने में कानूनी कार्यवाही पूरी करने और उसके तीन माह बाद किसान को मुआवजा देना तय किया है।

क्या था मामला
ठाणे जिले के श्रीवामे तालुका में तुकाराम के परिजनों की 9500 वर्ग मीटर जमीन को सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों के विपरीत जाकर हासिल किया। राज्य सरकार के औद्योगिक विकास निगम ने उल्हास नगर परियोजना के लिए 1964 में जमीन अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी की थी। इस परियोजना के तहत अन्य किसानों की भूिम भी अधिग्रहीत की गई थी।

बाकी किसानों को 1966 में ही मुआवजा दे दिया गया। लेकिन जोशी का परिवार पिछले 50 साल से मुआवजे के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता रहा। राज्य सरकार ने जोशी परिवार के साथ हुई नाइंसाफी को 1981 में महसूस किया। उसे मुआवजा देने की कानूनी प्रक्रिया फिर से शुरू की गई। लेकिन कुछ समय की सक्रियता के बाद सरकारी तंत्र सो गया।
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