पी. चिदंबरम का वित्त मंत्रालय में वापसी का एक साल पूरा हो गया है लेकिन जिन उम्मीदों को लेकर उनकी वापसी हुई थी, उन पर खरे उतरने की बात पर सवालिया निशान लग रहे हैं।
आम आदमी के जीवन की बेहतरी के सभी मानकों पर अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता हुई है।
महंगाई से लेकर रोजगार और विकास दर तक सभी मोर्चों पर हालात बिगड़े हैं हालांकि उनका दावा है कि सरकार बहुत तेजी से फैसले ले रही है और अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आएगी लेकिन, चुनावी साल में उनका यह दावा कितना सही हो पाएगा यह कहना मुश्किल है।
महंगाई:
आम आदमी से जुड़ा सबसे अहम मुद्दा महंगाई है। पिछले एक साल में अधिकांश वस्तुओं की कीमतों में इजाफा हुआ है। सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि कीमतों में बढ़ोतरी दहाई में रही है।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक गत जून में खुदरा महंगाई दर 9.87 फीसदी रही है। फल, सब्जियों, दूध और उसके उत्पाद के दाम इससे कहीं ज्यादा तेजी से बढ़े हैं। खाद्यान्नों की कीमतों में तो करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
विकास दर:
दुनिया में सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार रहे भारत की विकास दर अब पांच फीसदी से नीचे आ गई है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक मार्च, 2013 को समाप्त तिमाही में यह 4.8 फीसदी रही थी जो दशक में सबसे कम है।
रिजर्व बैंक ने 30 जुलाई को जारी मौद्रिक नीति की समीक्षा में चालू साल के लिए विकास दर को घटाकर 5.5 फीसदी कर दिया है जबकि सरकार छह फीसदी के दायरे में उम्मीद पाले हुए है।
रुपया:
डॉलर के मुकाबले अभी तक के सबसे कमजोर स्तर 61.21 तक पहुंचा रुपया आम आदमी की मुसीबत बढ़ा रहा है। चालू खाते घाटे को भी इसने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया है।
कमजोर होते रुपये से जहां पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं वही उपभोक्ता उत्पादों और खाने पीने की चीजें भी महंगी हो रही हैं।
निवेश का माहौल:
आम जनता को निवेश के अच्छे विकल्प भी नहीं मिल पाए। आम निवेशकों के बीच प्रचलित म्यूचुअल फंड ने निराश ही किया। आंकड़ों के हिसाब से शेयर बाजार ने थोड़ी मजबूती दिखाई।
बीते एक साल में बीएसई सेंसेक्स में करीब 200 अंकों की तेजी रही लेकिन बाजार का दायरा आम लोगों के बीच फैल नहीं पाया। राजीव गांधी इक्विटी योजना आम लोगों को शेयर बाजार के प्रति आकर्षित करने में बहुत सफल नहीं हो पाई है।
डीजल/पेट्रोल की मार:
आम लोगों की जेब पर डीजल-पेट्रोल ने बहुत दबाव बढ़ाया है। दिल्ली में इस एक साल में डीजल 41.12 रुपये प्रति लीटर से धीरे-धीरे 51.40 रुपये प्रति लीटर हो गया। इसने बेतहाशा महंगाई बढ़ाई। भाड़े और खेती-किसानी की लागत भी बढ़ गई।