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अब लाइव देख सकेंगे अंतिम संस्कार

Thu, 25 Jul 2013 12:06 AM IST
जयपुर/समीर शर्मा
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आम तौर पर हिंदू समाज में विद्युत शवदाह गृहों के प्रति उदासीनता रहती है। वह इसलिए क्योंकि इन गृहों पर अंतिम संस्कार के सभी कर्मकाण्ड नहीं हो पाते हैं।
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मगर आपको अपनी यह सोच बदलनी होगी। क्योंकि राजस्थान में एक ऐसा विद्युत शवदाह गृह खुला है, जो सूचना प्रौद्योगिकी का उम्दा इस्तेमाल कर रहा है और संस्कृति को भी पूरी अहमियत दे रहा है।

इस शवदाह गृह में हिंदू संस्कृति के तहत सभी कर्मकाण्डों का समावेश किया गया है। यह देश का पहला विद्युत शवदाह गृह है, जिसमें कपाल क्रिया संभव है।

यही नहीं, इंटरनेट के जरिए विश्व के किसी भी कोने में बैठे परिजन या जानकार संबंधित व्यक्ति का अंतिम संस्कार लाइव देख सकेंगे।

इस अत्याधुनिक शवदाह गृह में शव के दाह के समय अग्नि का भी वही स्वरूप दिखाई देगा, जैसा लकड़ी की शैया पर मुखाग्नि देने के बाद दिखाई देता है। यहां अंतिम संस्कार की व्यवस्था नि:शुल्क रखी गई है।
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राजस्थान के कोटा शहर में खुला अपनी तरह का यह पहला विद्युत शवदाह गृह है, जो भविष्य को देखते हुए पर्यावरण की रक्षा करने के साथ अंतिम संस्कार के सभी क्रियाकलापों को भी पूरा करेगा।

85 लाख होगी लागत
मधुश्री परिवार की ओर से प्रेमादेवी हिसारिया चेरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से कोटा के किशोरपुरा मुक्तिधाम में करीब 85 लाख रुपये की लागत से ये शवदाह गृह तैयार किया गया है।

इसमें कोटा नगर निगम की ओर से 25 लाख रुपये की राशि भी शामिल है। इसका निर्माण 3 हजार वर्ग फीट क्षेत्र में किया गया है।

मुक्तिधाम में अंतिम यात्रा में शामिल लोगों के लिए 2 हजार वर्ग फीट की एसी लॉबी भी बनाई गई है। मुख्य गृह को 18 फीट ऊंचाई दी गई है, जिससे भभक का माहौल नहीं बने।
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650 डिग्री सेल्सियस से 850 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर अंतिम संस्कार होगा। पूरे संस्कार में 60 से 70 मिनट लगेंगे।

वेबसाइट की तैयारी अंतिम चरण में
शवदाह गृह की वेबसाइट का काम जोरों पर है। जब सीधे प्रसारण की सुविधा जुड़ जाएगी, तो दूर-दराज के लोग दाह से पहले अपने प्रिय का अंतिम दर्शन भी कर सकेंगे।

परंपरा के अनुसार महिलाएं शवदाह गृह नहीं जातीं। अब वे भी इंटरनेट के जरिए अंतिम संस्कार का सीधा प्रसारण देख सकेंगी।

इस शवदाह गृह में कपाल क्रिया की व्यवस्था भी होगी। अब तक देश में किसी भी विद्युत शवदाह गृह में कपाल क्रिया की व्यवस्था नहीं है।

यह होती है कपाल क्रिया
चिता को मुखाग्नि देने के बाद करीब पौन घंटे बाद कपाल क्रिया की जाती है। इसके तहत लकड़ी के एक छोर पर नारियल के अंदर घी डालकर शव के कपाल (सिर) पर चोट की जाती है। माना जाता है कि जब तक कपाल नहीं खुलेगा तब तक शव का पूरा दाह नहीं होगा।
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