एक बहुत पुरानी कहावत है कि करे कोई, भरे कोई। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सांसद तापस पाल के मामले में यह कहावत हुबहू चरितार्थ हो रही है।
अपने विवादास्पद बयानों के बावजूद तापस महज लिखित माफीनामा जारी कर साफ बच निकले। तृणमूल कांग्रेस ने न तो उनको कारण बताओ नोटिस दिया और न ही उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की।
वहीं, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पुत्र और जंगीपुर के कांग्रेस सांसद अभिजीत मुखर्जी तापस के समर्थन में महज एक बयान देकर पार्टी के प्रदेश नेतृत्व का कोपभाजन बन गए हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने अभिजीत को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
तापस पाल के वीडियो से मचा तूफान
मालूम हो कि तापस पाल के विवादास्पद बयानों के तीन वीडियो सामने आने के बाद बंगाल की राजनीति में तूफान मचा हुआ है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने महज लिखित माफीनामा लेकर उनको बख्श दिया।
दूसरी ओर, इस मुद्दे पर बढ़ते विवाद के बाद अभिजीत ने कहा था कि कभी-कभी जबान फिसलने से ऐसी गलतियां हो जाती हैं। उन्होंने कहा था कि अब जबकि तापस पाल ने अपने विवादास्पद बयानों के लिए बिना शर्त लिखित माफी मांग ली है, इस मुद्दे को और तूल नहीं दिया जाना चाहिए।
कांग्रेस नेताओं को अभिजीत का यह बयान नागवार गुजरा। अधीर चौधरी ने उसी दिन एक बयान जारी कर कहा कि यह अभिजीत के निजी विचार हैं और पार्टी उनके विचारों से सहमत नहीं है, लेकिन मामला इसी से नहीं थमा।
प्रदेश नेतृत्व ने अभिजीत को एक पत्र भेज कर इस मामले पर उनसे लिखित सफाई मांगी है। अधीर कहते हैं कि मौजूदा परिस्थिति में अभिजीत को ऐसा बयान नहीं देना चाहिए था। मैंने उनसे लिखित सफाई मांगी है।
ममता सरकार ने मामला ठंडे बस्ते में डाला
इस बीच, इस मुद्दे पर विपक्ष के लगातार प्रदर्शन और हंगामे के बावजूद तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी की अगुवाई वाली उसकी सरकार ने अब इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
सरकार ने अब तक केंद्रीय गृह मंत्रालय को भी इस मामले पर कोई रिपोर्ट नहीं भेजी है। उधर, विपक्षी संगठनों ने ममता बनर्जी पर तापस को बचाने का आरोप लगाया है।
राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्र कहते हैं कि तापस पाल ने विवादास्पद बयान देकर जितनी गलती की है उससे कहीं ज्यादा बड़ी गलती ममता ने इसे छोटी करार देकर की है।
उन्होंने तापस की गिरफ्तारी की मांग दोहराई है। उनका आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस नेताओं के भड़काऊ बयानों की वजह से ही ग्रामीण इलाकों में माकपा समर्थकों पर हमले बढ़े हैं।