फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नोकियाः दिल का कनेक्शन टूटा है, गम तो होगा!

Thu, 05 Sep 2013 12:10 PM IST
भरत शर्मा
विज्ञापन
विज्ञापन
करीब 30 बरस पहले सात समंदर पार एक ऐसा जादुई खिलौना बना, जिसे शुरुआत में हल्के में लिया गया, लेकिन बाद में उसकी चमक ने पूरी दुनिया को अपने आगोश में ले लिया।
विज्ञापन


यूरोप के एक छोटे से मुल्क में कंपनी के चंद इंजीनियर और तकनीशियन ने मिलकर जिस वक्त इस प्रोडक्ट को आकार दिया, उन्हें खुद अंदाजा नहीं था कि कुछ साल में वह संचार टेक्नोलॉजी की शक्लो-सूरत बदल देगा।

ऐसा नहीं कि हथेली में समाने वाला और बिना किसी तार के कोसों दूर मौजूद व्यक्ति से बात कराने वाला मोबाइल फोन पहले नहीं था।

लेकिन कई बार ऐसा होता है कि ईजाद कोई करता है और सुधार के साथ कोई दूसरा दुनिया पर छा जाता है। इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ।

इस चमत्कार को आकार देने वाली कंपनी का नाम था नोकिया और उस जादुई प्रोडक्ट को हम मोबाइल के नाम से जानते हैं।

फोन ने दी नई पहचान
भले नोकिया इससे पहले भी बड़ी कंपनी थी और दूसरी इंडस्ट्री में अपने जौहर दिखा रही थी, लेकिन मोबाइल ने जो पहचान उसे दी, वह शायद किसी और चीज से उसे नहीं मिली।
विज्ञापन


नोकिया ने 1981 में एनएमटी मोबाइल फोन स्टैंडर्ड बनाया और पहला एनएमटी फोन मोबिरा सिटीमैन लॉन्च किया। इस नायाब क्रांति से मुलाकात के लिए देश को 1994 तक इंतजार करना पड़ा।

इसके अगले साल भारत में पहली जीएसएम कॉल हुई, जो नोकिया 2110 मोबाइल फोन से उसके ही नेटवर्क पर की गई थी।

यह वह दौर था, जब देश में टेलीकॉम नीति मोबाइल फोन उद्योग की ग्रोथ के लिए मुफीद नहीं थी। भारी-भरकम इम्पोर्ट ड्यूटी और इनकमिंग कॉल के लिए 16 रुपए प्रति मिनट की दर ने लोगों को मोबाइल से दूरी बनाए रखने पर मजबूर कर दिया।

लेकिन एक बार जब मोबाइल फोन की ताकत का अंदाजा हुआ और सरकारी नीतियों में बदलाव आया, तो यह कुछ इस कदर छाया कि हर जगह दिखने लगा।

नोकिया था सबसे बेहतर
हमारे देश में अगर ठेलेवाले से लेकर एग्जिक्यूटिव के हाथ में आज मोबाइल नजर आता है, तो इसका बड़ा श्रेय नोकिया को जाता है।

एप्पल और सैमसंग जैसी कंपनियों की हाई-फाई टेक्नोलॉजी और चीनी मोबाइल की किफायत से कई साल पहले नोकिया ही थी, जिसने अपने स्मार्ट, इस्तेमाल करने में आसान, लंबे बैटरी बैक-अप और जेब पर कम बोझ डालने वाले मोबाइल से भारतीय बाजार पाट दिया था।

उस वक्त मोबाइल फोन का मतलब नोकिया और नोकिया का मतलब ही मोबाइल फोन हुआ करता था। जिस तरह वॉशिंग पाउडर को सर्फ, रिफाइंड तेल को डालडा और अलमारी को गोदरेज कहा जाता था, नोकिया ने ठीक उसी तरह मोबाइल फोन की जगह ली।

दिल में बसा ब्रांड
ऐसा ब्रांड जो ग्राहकों के दिल से जुड़ गया। लेकिन अब यह ब्रांड जा रहा है। माइक्रोसॉफ्ट और नोकिया के बीच हुए करार का ब्योरा धीरे-धीरे बाहर निकल रहा है, लेकिन आशंका है कि दुनिया को अब दोबारा नोकिया मोबाइल फोन नहीं दिखेगा।

सॉफ्टवेयर दिग्गज, फिनलैंड की कंपनी का डिवाइस और सर्विसेज डिविजन खरीद रही है, लेकिन नोकिया ब्रांड नहीं। हालांकि, लूमिया और आशा जैसे ब्रांड अब नोकिया के हाथ में नहीं रहेंगे। नोकिया अलग कंपनी बनी रहेगी और उसकी ब्रांडिंग पर भी उसका अधिकार होगा, लेकिन वह शायद दोबारा मोबाइल फोन न बना सके।

जाहिर है, जो लोग इस ब्रांड से मोहब्बत करते हैं, उन्हें इसके जाने का कितना गम है, इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। लेकिन नोकिया अगर अर्श से आज फर्श पर है, तो इसके लिए भी वह खुद जिम्मेदार है।

क्यों चूकी कंपनी?
जब एप्पल ने आईफोन उतारा, तो नोकिया का कहना था कि टच करके फोन कौन चलाएगा? इसके बाद जब दूसरी कंपनियों ने डबल सिम का दांव खेला, तो भी उसकी रफ्तार सुस्त रही। जाहिर है, ये दोनों कदम उसके लिए आत्मघाती बन गए।

यह दिलचस्प है कि जब नोकिया नाकामी का चोगा ओढ़ने के बाद माइक्रोसॉफ्ट के हाथों बिक रही है, तो भी उसकी लाज बचाने का जिम्मा भी भारत पर रहेगा।

फिर भारत पर नजर
नोकिया भले दुनिया भर में पिट रही हो, लेकिन देश में अब भी दूसरे पायदान पर काबिज है। जानकारों का मानना है कि माइक्रोसॉफ्ट जब इस ब्रांड को दोबारा खड़ा करने की कोशिश करेगी, तो भारत एक आकर्षक बाजार का किरदार अदा करेगा।

विंडोज पर चलने वाली लूमिया सीरीज और सस्ते फोन की सीरीज आशा ने नोकिया में कुछ जान फूंकी है।

भारत नोकिया के ग्लोबल कारोबार में अहम भूमिका अदा करता है। वह चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा बाजार है और ऐसे चुनिंदा बाजारों में शुमार है, जो मुनाफा दे रहे हैं।

एक बड़ा ब्रांड रुखसत ले रहा है, तो गम में आंखें छलकना स्वाभाविक है, लेकिन नोकिया सबक है इस बात का कि टेक्नोलॉजी की दुनिया में जो खुद को नहीं बदलते, उन्हें ग्राहक 'बदल' देते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें