रविवार को आ रहे चार राज्यों के चुनाव नतीजों को लेकर जैसे जैसे गिनती आगे बढ़ेगी। वैसे वैसे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का ख्वाब देख रहे दिग्गजों की धड़कनें भी बढ़ेंगी।
दरअसल, भाजपा में जहां हर राज्य के लिए मुख्यमंत्री का उम्मीदवार पहले से ही तय है मगर कांग्रेस में ऐसा नहीं है। खिचड़ी पकने से पहले ही इसे खाने के लिए पार्टी के अंदर मारामारी मची हुई है।
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कांग्रेस को सबसे ज्यादा जीत का भरोसा है। यहां एक अनार सौ बीमार की हालत है। नेता अपनी जीत के हवाई किले तो बना ही रहे हैं तो साथ ही दिल्ली में डेरा डाल कर हाईकमान को साधने के लिए मीडिया से लेकर उनके सिपाहसलारों तक से संपर्क कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कांग्रेस दस साल से सत्ता से बाहर है। चार राज्यों में सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही पार्टी हाईकमान को सबसे ज्यादा जीत की उम्मीद है। इसलिए यहां के नेता जोड़ तोड़ की राजनीति में ज्यादा जुटे हैं।
अजित जोगी मीडिया प्रबंधन के लिए लंच की दावत दे रहे हैं। जीत का दावा करते हैं। मगर मुख्यमंत्री के सवाल पर फैसला हाईकमान पर छोड़ने की बात कर रहे हैं। अंदरखाने अपनी दावेदारी जता चुके हैं। वहीं जोगी के धुरविरोधी प्रदेश अध्यक्ष चरण दास महंत खुद को हाईकमान की पहली पसंद मानते हैं। मगर जोगी उनकी राह में रोड़ा है।
ऐसे में कांग्रेस की किस्मत पलटी तो बाजी बुजुर्ग कांग्रेस कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा बाजी मारं जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। वोरा कहते हैं कि उन्हें किसी पद की इच्छा नहीं। हाईकमान जो कहेगा वे वही करेंगे। जीत से पहले ही लॉबिंग का खेल जारी है।
परिणाम अच्छे आते है तो फिर क्या हाल होगा। यह तो वक्त बताएगा। उधर मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठना चाहते हैं। उनके रास्ते कमलनाथ और यहां तक कि दिग्विजय सिंह रोड़ा है। वह राहुल गांधी से लगातार संपर्क में है, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी दो बार मिल चुके हैं।
राजस्थान में स्थिति कुछ साफ है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की उम्मीदवारी तय मानी जाती है। मगर उनके धुर विरोधी सी पी जोशी अपनी दावेदारी कम नहीं आंकते हैं। चुनाव नहीं लड़ने के बावजूद राजस्थान के नेता जोशी को मुख्यमंत्री की दौड़ में मानते है।
दिल्ली में अगर चौथी जीत मिलती है तो इसका सेहरा शीला दीक्षित के सिर ही बंधेगा। मगर अजय माकन की नजर भी शीला का विकल्प बनने पर है और इन दिनों वे राहुल के साथ पूरी तरह से तालमेल बना रहे हैं। कांग्रेस नेताओं की यह सियासत फिलहाल उम्मीदों पर ही है क्योंकि एक्जिट पोल के नतीजों के संकेत तो इन उम्मीदों को पंख लगाते नहीं दिख रहे।