राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई के दायरे में लिया जाना चाहिए या नहीं, इस पर सरकार ने अब तक इस बात पर कोई फैसला नहीं लिया है। जबकि केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा दी गई छह हफ्ते की समयावधि सोमवार को खत्म हो रही है।
आरटीआई एक्ट को लागू करने की जिम्मेदारी निभाने वाले डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) के अधिकारियों के मुताबिक सरकार राजनीतिक पार्टियों को इस पारदर्शिता कानून से बाहर रखने के लिए अध्यादेश लाने को ज्यादा उत्साहित नहीं है।
प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाला डीओपीटी इसके लिए सिविल सोसायटी से सलाह मशविरा कर सकता है। इसके बाद ही अध्यादेश लाने पर फैसला लिया जाएगा।
आरटीआई एक्ट में संशोधन को लेकर कानून मंत्रालय ने पहले ही स्वीकृति दे दी है। अगर आरटीआई एक्ट में किए गए संशोधन को सभी हित धारकों की मंजूरी मिल जाती है, तो इसे मानसून सत्र में पेश किया जा सकता है।
केंद्रीय सूचना आयोग ने कांग्रेस, भाजपा, एनसीपी, माकपा, भाकपा और बसपा को सूचना अधिकारी नियुक्त करने के लिए छह हफ्ते का समय दिया था, जो सोमवार को खत्म हो रहा है।
माना जा रहा है कि डीओपीटी आरटीआई एक्ट के अनुच्छेद 2 में संशोधन कर राजनीतिक पार्टियों को बचा सकता है। इसके अलावा सरकार राजनीतिक पार्टियों को छूट पाने वाले संगठनों की सूची में रख सकती है, जिसमें केंद्रीय सुरक्षा और खुफिया एजेंसी शामिल हैं।
हालांकि दूसरा विकल्प अपनाने के आसार काफी कम ही हैँ क्योंकि इसे जनता का विरोध झेलना पड़ सकता है।