विवादित भूमि अधिग्रहण विधेयक पर नीति आयोग के जरिये आगे बढ़ाने की केंद्र सरकार की कवायद भी नाकाम रही है। आयोग की संचालन समिति की बैठक का कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की ओर से बहिष्कार और अन्य मुख्यमंत्रियों के सुझाव के बाद केंद्र को महसूस हो गया है कि बिल पर आगे बढ़ने का यह उचित समय नहीं है। इसलिए बिल के ठंडे बस्ते में जाने के आसार बढ़ गए हैं।
खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कह कर स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वह राज्यों के सुझाव के मद्देनजर ही बिल पर कदम बढ़ाएंगे।
पीएम मोदी की अध्यक्षता में संपन्न हुई बैठक में भूमि अधिग्रहण बिल पर राजनीतिक सच्चाई जानने के बाद सरकार ने धीरे बढ़ने का निर्णय लिया है। अब माना जा रहा है कि विधेयक का भविष्य बिहार विधानसभा चुनाव के बाद तय होगा।
बदले रुख के लिए सरकार ने राज्यों के सुझाव को ढाल बनाया है। भूमि अधिग्रहण बिल संसद की संयुक्त समिति के पास होने के बावजूद इस मामले पर बुलाई गई आयोग की बैठक को सरकार की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। मगर बैठक में मुख्यमंत्रियों की राय जानने के बाद सरकार ने इस पर अपनी रणनीति में बदलाव किया है।
रोजगार और किसानों के लिए भूमि अधिग्रहण जरूरी
जेटली ने कहा कि कुछ राज्यों ने 2013 के कानून को विकास के लिए बाधा करार दिया है। देश में रोजगार के अवसर पैदा करने और किसानों की दशा सुधारने के लिए भूमि का अधिग्रहण जरूरी है। मगर अधिकतर राज्यों का सुझाव जल्द सर्वसहमति बनाने अथवा मामला उन पर छोड़ने का है।
उन्होंने बताया कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मौजूदा हालात को बिल के लिए उचित नहीं माना है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून को अभी देखने की बात कही।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कहा कि 13 मामलों में सामाजिक आकलन और सहमति के प्रावधान की छूट में केंद्र की जरूरी सभी परियोजनाएं शामिल हैं। विकास से जुड़े कामकाज राज्यों के जिम्मे हैं। इसलिए राज्यों के ऊपर यह फैसला छोड़ देना चाहिए कि वे अपने हिसाब से भूमि अधिग्रहण कानून बनाएं। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने भी सूबे के भूमि अधिग्रहण कानून को कारगर बताया है।
मसले को राज्यों पर छोड़ने का आया सुझाव : जेटली
बैठक के बाद मुख्यमंत्रियों के मत की जानकारी देते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि विकास के लिए भूमि चाहिए, इसमें कोई दो मत नहीं है। लेकिन बिल को लेकर जो अभियान चला, उससे यह छवि बनी है कि विधेयक के लिए यह उपयुक्त समय नहीं है।
राज्यों ने केंद्र से कहा कि बिल पर वह जल्द सर्वसम्मति बनाए अथवा निर्णय का मामला राज्यों पर छोड़ दे।
जेटली ने कहा है कि प्रधानमंत्री ने राज्यों से कहा है कि वह उनके सुझाव पर सोचेंगे। किसान के हित और विकास दोनों की अनदेखी नहीं होने दी जाएगी। प्रधानमंत्री अध्यक्षता में संपन्न हुई बैठक में महज 16 राज्यों के मुख्यमंत्री उपस्थित हुए।
गैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों में महज बिहार के नीतीश कुमार और दिल्ली के अरविंद केजरीवाल शामिल हुए। कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने बैठक का बहिष्कार किया। जेटली ने इस बहिष्कार को संघीय ढांचे के खिलाफ करार दिया। बिल पर राज्यों की राय जानने के लिए बुलाई गई बैठक में सरकार को नाकामी हाथ लगी है।
सरकार के रुख को उसके कुछ अपने मुख्यमंत्रियों का भी साथ नहीं मिला। पार्टी शासित मुख्यमंत्री भी वर्तमान समय को बिल पर आगे बढ़ने के लिए वाजिब नहीं मान रहे हैं।
बंगाल में जबरन भूमि अधिग्रहण नहींः ममता
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को फिर कहा कि उनकी सरकार जमीन का कभी भी जबरन अधिग्रहण नहीं करेगी। दिल्ली में नीति आयोग की बैठक में गैरहाजिर रहने वाली ममता ने कहा कि बंगाल में वैकल्पिक भूमि नीति का पालन किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि हम अनिश्चितकाल तक केंद्र की भूमि अधिग्रहण नीति का इंतजार नहीं कर सकते। वैकल्पिक भूमि नीति के तहत बातचीत के जरिए जमीन खरीदी जा सकती है। उन्होंने कहा कि जमीन मालिकों से सीधे जमीन खरीद कर सरकार ने कई परियोजनाएं पूरी की है।
केंद्र की लंबित भूमि अधिग्रहण नीति की वजह से कई परियोजनाओं का काम ठप हो गया था, लिहाजा उन्हें एक वैकल्पिक नीति बनानी पड़ी।
दो अक्टूबर से अनशन करेंगे अन्ना
सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने बुधवार को घोषणा की कि वह पूर्व सैनिकों के लिए लंबित ‘वन रैंक वन पेंशन’को लागू कराने और विवादास्पद भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ आगामी दो अक्तूबर से दिल्ली के रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठेंगे।
अन्ना ने कहा कि उन्होंने इन दोनों मुद्दों पर हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा था। 78 वर्षीय अन्ना करीब चार साल बाद रामलीला मैदान में अनशन की तैयारी कर रहे हैं।
इससे पहले, उन्होंने लोकपाल के मुद्दे पर जून 2011 में आमरण अनशन किया था।