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बलात्कारियों को फांसी पर राज्यों में नहीं बनी सहमति

Sat, 05 Jan 2013 12:33 AM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
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बलात्कारियों को फांसी दिए जाने के पक्ष में राय नहीं बन सकी है। केंद्र सहित ज्यादातर राज्यों ने बलात्कारियों के लिए फांसी के बजाय कानून पालन की प्रक्रिया को सख्त कर उम्रकैद की सजा तय करने की मंशा जाहिर की है।
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इन राज्यों का मानना है कि बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा कानूनी लिहाज से अव्यवहारिक है। केंद्र ने भी अपनी ओर से फांसी की सजा का प्रस्ताव या सुझाव राज्यों के पुलिस महानिदेशकों की बैठक में नहीं रखा। हालांकि कई राज्यों ने केंद्र से नाबालिग माने जाने की आयु सीमा 18 से घटाकर 16 साल करने की पुरजोर वकालत की।

दिल्ली में युवती के साथ दरिंदगी की घटना में गिरफ्तार नाबालिग लड़के की उजागर घिनौनी करतूतों के बाद उम्र की सीमा कम करने पर नई बहस शुरू हो गई है। इस घटना पर देशभर में जारी उबाल के मद्देनजर शुक्रवार को महिलाओं की सुरक्षा के साथ अनुसूचित जाति व जनजाति (एससी/एसटी) के लोगों की सुरक्षा पर राज्यों के मुख्य सचिवों व पुलिस महानिदेशकों की एक दिवसीय बैठक के दौरान नाबालिग की उम्र सीमा घटाने पर राय सामने आई।
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बैठक में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सहित करीब दर्जन भर राज्यों ने नाबालिग की उम्र सीमा घटाकर 16 साल करने की पुख्ता सिफारिश की। हालांकि इस मामले में केंद्र और राज्यों के बीच आम सहमति नहीं बन पाई।

बैठक खत्म होने के बाद गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि ज्यादातर राज्यों ने बलात्कारियों के लिए न्याय प्रक्रिया सख्त कर उम्रकैद की सजा देने पर सहमति जाहिर की है। केंद्र ने भी अपनी तरफ से फांसी की सजा के लिए कोई सिफारिश नहीं की है।

सरकार की दलील है कि कानून की बारीकियों की वजह से फांसी की सजा के प्रावधान के बाद सजा की प्रक्रिया बहुत धीमी हो जाएगी। शिंदे के मुताबिक इस बैठक में महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से कई सिफारिशें आई हैं। केंद्र इन पर गौर करने के बाद अंतिम फैसला लेगा। कानून में फेरबदल पर फैसला जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिशों के बाद ही लिया जाएगा।

देशभर में पुलिस को महिलाओं के साथ बच्चों और एससी/एसटी वर्ग की सुरक्षा की खास जिम्मेदारी दिए जाने का फैसला लिया गया है। इसके लिए थानों में महिला पुलिस की बढ़ोतरी और गश्त को पुख्ता करने जैसे उपायों के साथ न्याय प्रक्रिया को तेज करने की जरूरत पर आम सहमति बनी। इसके तहत साक्ष्य कानून यानी एविडेंस एक्ट और गवाहों को परेशान नहीं किए जाने संबंधी नियमों में बदलाव पर भी गंभीर चर्चा की गई।

साथ ही केंद्र ने राज्यों से कहा है कि वह छोटे से छोटे शहरों और कस्बों में पुलिस की चेहरे को बदलने की कवायद शुरू करें ताकि कोई भी आम नागरिक पुलिस थाने में बेहिचक अपनी रिपोर्ट लिखा सके। इसके साथ ही थाने स्तर पर महिलाओं और एससी/एसटी के प्रति सामंती नजरिए में बदलाव लाने की कोशिशें भी तेज की जाएं।

बैठक में केंद्र और राज्यों के सभी सरकारी तंत्रों के साथ मिलकर ऐसे उपाए निकालने पर सहमति बनी कि पीड़ित पक्ष को न्याय मिलने में ज्यादा वक्त नहीं लगे।

पुलिस में 33 फीसदी महिलाएं हों
केंद्र सरकार ने हर राज्य से अपने यहां पुलिस बलों में महिलाओं की संख्या कम से कम 33 फीसदी करने को कहा है। केंद्र ने कहा है कि इस तरह का माहौल बनाया जाना चाहिए ताकि लोग बिना किसी हिचकिचाहट के थानों में जा सकें और अपनी परेशानी बता सकें। केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने कहा कि मौजूदा समय में देश की कुल पुलिस फोर्स में महिलाओं की तादाद केवल 3.98 फीसदी ही है।

दिल्ली पुलिस में होगी 2,500 महिलाओं की भरती
दिल्ली पुलिस में जल्द ही 2508 महिलाओं की भरती होगी। इस बारे में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक प्रस्ताव वित्त मंत्रालय को भेजते हुए इसे तत्काल मंजूरी देने को कहा है। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने बताया कि दिल्ली में 166 थाने हैं और हर थाने में दो महिला सब इंस्पेक्टर और 10 महिला कांस्टेबल तैनात की जाएंगी। 2508 पदों में 418 इंस्पेक्टर के होंगे। दिल्ली में मौजूदा 83000 पुलिस कर्मियों में केवल 6000 ही महिलाएं हैं।

दुष्कर्म जैसी घटनाएं अस्वीकार्य हैं। हमें पूरी व्यवस्था का आकलन करना होगा। हमें सख्त कदम उठाने की जरूरत है। पूरा देश आज हमसे उम्मीद लगाए है। हमें महिलाओं से होने वाली छेड़छाड़, तेजाब से हमले, या अन्य किसी भी तरह के हमलों पर जीरो टॉलरेंस का रुख अपनाना होगा।--सुशील कुमार शिंदे, गृह मंत्री
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