प्रमोशन के बदले रिश्वत मामले में रेल मंत्री पवन कुमार बंसल इस्तीफा नहीं देंगे।
प्रधानमंत्री निवास पर लगभग तीन घंटे चली कोर ग्रुप की बैठक के बाद सरकार और कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि जांच पूरी होने तक बंसल के इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता।
साथ ही कानून मंत्री अश्विनी कुमार के इस्तीफे की विपक्ष की मांग भी सरकार और पार्टी ने ठुकरा दी है।
दोनों मंत्रियों का नैतिकता के आधार पर इस्तीफा मांग रही भाजपा को पार्टी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपना चेहरा आइने में देखने की सलाह दे कर साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे पर अब आर-पार की लड़ाई के मूड में है।
हालांकि पार्टी और सरकार ने जांच पूरी होने तक इस्तीफा नहीं लेने की बात कर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि दोनों मंत्रियों के सिर से संकट टला नहीं है।
इस्तीफे से दो टूक इंकार के बाद सरकार और विपक्ष के बीच जुबानी जंग और तेज होना व संसद में टकराव बढ़ना तय हो गया है।
कोर ग्रुप की बैठक के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा कि जहां तक रेल मंत्री और कानून मंत्री के मामले की बात है तो जांच प्रक्रिया चल रही है। रेल मंत्री ने जांच का स्वागत किया है।
बैठक में तय किया गया कि जब तक जांच प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक इस संबंध में कोई भी निर्णय अनुचित होगा। इसलिए न तो रेल मंत्री इस्तीफा देंगे और न ही कानून मंत्री।
उन्होंने कहा कि कोलगेट मामले में 8 मई को शीर्ष अदालत में सुनवाई होनी है। सरकार अपने विधि अधिकारियों के माध्यम से अदालत के समक्ष अपनी बात रखेगी।
जब उनसे भाजपा के नैतिकता के आधार पर इस्तीफा मांगने के संबंध में पूछा गया तो उन्होंने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा कि अपने कार्यकाल में भ्रष्टाचार के तमाम मुद्दों पर सुविधाजनक रवैया अपनाने वाली भाजपा को अपना चेहरा आइने में देख लेना चाहिए।
रविवार को अचानक कोर ग्रुप की बैठक बुलाई गई तो एकबारगी लगा कि बंसल की मंत्रिमंडल से विदाई हो सकती है।
सूत्रों के मुताबिक बैठक में इस मुद्दे पर गहन विचार विमर्श के बाद इस आधार पर बंसल का इस्तीफा इसलिए नहीं लिया गया क्योंकि सरकार पर विपक्ष का दबाव और बढ़ जाएगा।
बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने यूपीए की दूसरी पारी की शुरुआत से ही विपक्ष के तीखे हमले से निपटने के लिए जवाबी और ताबड़तोड़ आक्रमण की सलाह दी।
इसी के मद्देनजर अचानक प्रवक्ताओं की नई टीम बना कर उसमें तेजतर्रार नेताओं को शामिल किया गया तो दूसरी ओर सांसदों को दिल्ली तलब कर खासतौर से भाजपा के खिलाफ आरपार की लड़ाई की रणनीति बनी।
सूत्रों के मुताबिक बैठक में इस निर्णय पर पहुंचने से पहले संख्या बल पर भी जम कर माथापच्ची हुई। इस मामले में सभी सहयोगी दलों के साथ रहने, राजद के साथ-साथ जद यू के अध्यक्ष शरद यादव का बंसल के साथ खड़ा होना रेल मंत्री के पक्ष में गया।
पार्टी के रणनीतिकारों का कहना था कि इस मामले में बसपा सरकार के साथ है, तो सपा ने अब तक रेल मंत्री के खिलाफ बयान नहीं दिया है।
ऐसे में बंसल या अश्विनी के इस्तीफे के बदले पार्टी और सरकार को भाजपा के खिलाफ एकजुट हो कर तीखा हमला बोलना चाहिए।
हालांकि रेल मंत्री और कानून मंत्री के इस्तीफे से कांग्रेस ने इंकार कर दिया है, लेकिन इसके बावजूद इनके सिर से खतरा टला नहीं है।
कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि 8 मई को शीर्ष अदालत का रुख अगर कानून मंत्री के खिलाफ रहता है तो सरकार उनके संबंध में दो टूक फैसला करने पर मजबूर होगी।
इसी प्रकार अगर सीबीआई की जांच में कहीं से भी सीधे रेल मंत्री पर अंगुली उठी तो उनकी गाड़ी पटरी से उतर सकती है।