निर्भया कांड के एक साल गुजरने के बाद भी सरकार महज वादों से ही दिल जीतने की कोशिश में लगी हुई है।
इस हादसे के बाद सरकार ने निर्भया फंड की घोषणा जरूर कर दी, लेकिन घोषणा के दस माह बाद भी इस योजना को अमली जामा पहनाना शेष है।
यह भी कम दुखद नहीं है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और शोषण के विरोध में कई दफा प्रतिक्रिया दे चुके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता वाली नेशनल मिशन अथॉरिटी (एनएमए) की एक भी बैठक इस साल नहीं हुई है। यही नहीं इसके सदस्यों की जिम्मेदारी भी अब तक तय नहीं की गई है।
सरकार के वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि एनएमए की बैठक को लेकर आज तक कोई भी कदम नहीं उठाया गया है। एक हजार करोड़ के निर्भया फंड को लेकर भी अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। 16 दिसंबर 2012 के हादसे के बाद गठित की गई जस्टिस वर्मा समिति की सिफारिशों को अब तक पूरी तरह से अपनाया नहीं जा सका है।
हालांकि सरकार की बिगड़ती छवि को देखते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने हाल में निर्भया फंड के इस्तेमाल को लेकर प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी है।
उन्होंने पीएम से निर्भया फंड जारी कराने के साथ ही मंत्रालय की ओर से तैयार की गई योजना के लिए रकम जारी करने का आग्रह किया है। तीरथ ने कहा है कि देश भर में महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक प्रस्ताव तैयार कर वित्त मंत्रालय को सितंबर माह में ही भेजा जा चुका है, लेकिन वित्त मंत्रालय ने अब तक इस ओर कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया है।
केवल महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ही नहीं, बल्कि गृह मंत्रालय, सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय और सड़क एवं परिवहन मंत्रालय की ओर से भी वित्त मंत्रालय के समक्ष महिलाओं की सुरक्षा को लेकर प्रस्ताव भेजा जा चुका है, लेकिन सभी मंत्रालयों को नोडल मंत्रालय से पर्याप्त रकम मिलने का अब तक इंतजार है।
वित्त मंत्रालय ने नहीं उठाई कोई जहमत
प्रस्तावित योजनाओं में महिलाओं के लिए सुरक्षा नेटवर्क तैयार करने की बात है। तमाम मंत्रालयों की ओर से योजना का प्रारूप तैयार कर भेजे जाने के बावजूद वित्त मंत्रालय ने रकम खर्च करने की जहमत नहीं उठाई है। ऐसे में पूरी योजना पर संबंधित मंत्रालय गेंद एक दूसरे के पाले में डालने में लगे हुए है।
एसओएस अलर्ट योजना भी ठंडे बस्ते में
सूत्रों के मुताबिक सूचना व प्रौद्योगिकी मंत्रालय और गृह मंत्रालय की ओर से दिये गए प्रस्तावों में प्रत्येक मोबाइल हैंडसेट में अनिवार्य रूप से एसओएस अलर्ट बटन रखने की योजना भी रकम के अभाव में ठंडे बस्ते में पड़ी है। अगर योजना शुरू होती तो महिलाएं जरूरत पड़ने पर पुलिस प्रशासन से आसानी से जुड़ सकती थीं।
निर्भया कांड से जागरूक हुई महिलाएं
सरकार की ओर से ठंडी प्रतिक्रिया मिलने के बावजूद महिलाएं 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में चलती बस में युवती के साथ हुए गैंगरेप की घटना के बाद जागरूक हुई है। यही वजह है कि नामीगिरामी हस्तियों के खिलाफ भी महिलाएं खुलकर सामने आने लगी हैं।
नहीं बढ़ रहा पुलिस का भय
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक इस वर्ष महिलाओं के खिलाफ अपराध के 2.44 लाख मामले सामने आए हैं, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 2.28 लाख थी। सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी का कहना है कि निर्भया कांड के बाद सामाजिक चेतना बढ़ी है। पुलिस पर राजनीतिक और सामाजिक दबाव बढ़ा है। इसके बावजूद गैंगरेप को अंजाम देने वालों में पुलिस का भय नहीं बढ़ रहा है। इस पर सरकार को सोचना चाहिए।