कांग्रेस के काफिले पर हमले की जिम्मेदारी लेने के लिए नक्सलियों की ओर से भेजे गए संदेश में सुरक्षा एजेंसियां काफी गहरा मतलब देख रही हैं।
एजेंसियां चुनिंदा मीडिया चैनलों को भेजे गए ई-मेल में दो खास कांग्रेसी नेताओं के अलावा मारे गए लोगों के लिए अफसोस जताने को नक्सलियों की सोची समझी योजना का हिस्सा मान रही हैं।
खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां यह भी मान रही हैं कि छत्तीसगढ़ में राजनीतिक नेताओं के काफिले पर हमला कर नक्सलियों ने अपनी व्यापक योजना का लंबा सफर तय कर लिया है।
नक्सलियों के खिलाफ नई रणनीति बनाने में जुटे एक उच्चपदस्थ अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि अगर इस स्तर पर नक्सलियों को कारगर तरीके से नहीं दबोचा गया तो वह अगला निशाना बड़े शहरों को बनाएंगे।
अधिकारी के मुताबिक नक्सलियों के चार्टर में उनके तथाकथित संघर्ष का अंतिम लक्ष्य लांग मार्च है जिसके तहत वह दिल्ली पर लाल झंडा फहराने का सपना देख रहे हैं।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा और नंद कुमार पटेल के अलावा मारे गए 27 लोगों के लिए अफसोस जताकर नक्सली शहरी जनता की सहानुभूति लेना चाह रहे हैं।
खुफिया विभाग में माओवादी हिंसा पर काम कर रहे अधिकारी के मुताबिक नक्सलियों की सबसे बड़ी कमजोरी शहरी मध्यमवर्ग की सहानुभूति नहीं होना है।
नेताओं के काफिले पर हमले की अब तक मिली जानकारी के मुताबिक अत्याधुनिक हथियारों के अलावा सटीक सूचना तकनीक से लैस नक्सलियों का यह नया दस्ता खास मकसद से बनाया गया है। एजेंसियों को गंभीर अंदेशा है कि इन्होंने शहरों की तरफ लांग मार्च के अंतिम लक्ष्य के लिए काम करना शुरू कर दिया है।
अधिकारी ने बताया कि झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के जंगलों में अबूजमाड़ और दंडकारण्य जैसे फ्री जोन घोषित करना इनकी पहली कामयाबी थी।
नक्सली भाषा में फ्री जोन वह है जहां इनकी हुकूमत चलती है और जहां केंद्र और राज्य सरकार जाने में सक्षम नहीं। यह फ्री जोन दरअसल नक्सलियों का किला है जो दुर्गम और खतरनाक जंगलों से घिरा है।
अधिकारी के मुताबिक नक्सली अब हरेक प्रभावित राज्य के चुनावों में असर डालते हैं। पैसे और ताकत के खेल में माहिर हो चुके इन नक्सलियों ने बीते शनिवार को राजनेताओं पर हमला कर साफ कर दिया है कि उनका इरादा यहीं रुकने का नहीं है।