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नक्सली हमला: 11 सवाल, जिन पर नहीं हो रही चर्चा

Thu, 30 May 2013 11:31 AM IST
सुदीप श्रीवास्तव (सामाजिक कार्यकर्ता, छत्तीसगढ़)
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25 मई को छत्तीसगढ़ के सुकमा में कांग्रेस नेताओं पर नक्सलियों के बर्बर हमले ने कई सवाल खड़े किए हैं। ऐसे 11 सवाल जो प्रदेश सरकार और सुरक्षा अधिकारियों की लापरवाही को उजागर करते हैं।
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इस हमले में वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल समेत कई कांग्रेसी नेता मारे गए थे।

1. आजकल नक्सल समस्या पर बहुत चर्चा हो रही है। पर मेरा मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए दीर्घकालीन रणनीति बनाने की जरूरत है। हालांकि इस समय यह जानना बेहद जरूरी है कि इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं क्यों हो रही हैं?

2. संविधान के मुताबिक हर राजनीतिक दल को यह अधिकार है कि वह पार्टी से संबंधित कार्यक्रम चलाए। वहीं कानून-व्यवस्था राज्य सरकार के जिम्मे है। इन दलों के कार्यक्रम और अन्य गतिविधियों के लिए पूरी सुरक्षा मुहैया कराना प्रदेश सरकार का काम है।
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3. कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का कार्यक्रम पहले ही घोषित हो गया था और इसकी सूचना सरकार के सभी अधिकारियों को थी। ऐसे में कभी भी अधिकारियों ने सुरक्षा के अभाव में यात्रा के आयोजकों व नेताओं को यात्रा के कार्यक्रम में फेरबदल अथवा इसे स्थगित करने को नहीं कहा। इसके बावजूद नक्सली ऐसा सुनियोजित हमला करने में कैसे सफल रहे?

4. यह प्रासंगिक है कि कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के समय ही मुख्यमंत्री रमन सिंह ने एक और यात्रा (विकास यात्रा) करने का फैसला किया। 'विकास यात्रा' के दौरान रमन सिंह सूबे के कई हिस्सों में जाने वाले थे। मीडिया कवरेज और खुद रमन सिंह के शामिल होने से इस यात्रा के लिए भारी सुरक्षा का बंदोबस्त किया गया।

वहीं कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा में भी पूर्व केंद्रीय मंत्री सहित प्रदेश कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता शामिल थे। इनमें से महेंद्र कर्मा सहित कई नेता नक्सलियों की हिट लिस्ट में थे। यह बेहद अफसोस की बात है कि कांग्रेस की इस यात्रा में सुरक्षा अधूरी थी। जिस दिन यह घटना हुई उस दिन जगदलपुर और सुकमा के बीच सुरक्षा की कमी देखी गई।

5. यह जानना जरूरी है कि आखिर कैसे सुरक्षा अधिकारियों को नक्सलियों के इस बर्बर हमले की योजना की भनक तक नहीं लग पाई। कहा जा रहा है कि करीब 300-500 की तादाद में नक्सलियों ने इस बर्बर हमले को अंजाम दिया।

ये नक्सली विभिन्न इलाकों से एक जगह जमा हुए और घात लगाकर हमला किया। ऐसे रास्ते पर, जहां कांग्रेस नेताओं की यात्रा चल रही है, वहां इन नक्सलियों की आहट का भी पता नहीं चल पाना, कई सवाल खड़े करता है।

6. अभी तक नक्सल प्रभावित इलाकों में जिस भी व्यक्ति पर नक्सली हमले का अंदेशा रहा है, उसे बिना सुरक्षा के कहीं जाने की इजाजत नहीं होती। यदि सुरक्षा अधिकारियों को यह पता था कि इस रास्ते से कांग्रेस नेताओं का काफिला आ रहा है तो फिर यह भारी चूक कैसे हो गई।

7. अभी केंद्रीय सुरक्षा बलों की 10 बटालियनों के अलावा बड़ी तादाद में राज्य के पुलिसकर्मी नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात हैं। जब रमन सिंह विकास यात्रा पर थे तो सुकमा, जगदलपुर और जीरम घाट में सुरक्षाबलों ने सघन अभियान चलाया था, ताकि किसी दुर्घटना से बचा जा सके। वहीं कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के दौरान इस तरह की सुरक्षा से जुड़े कदम नहीं उठाए गए।

8. किसी भी राजनीतिक यात्रा का अचानक रूट बदलने से जनता के अलावा सुरक्षा अधिकारियों को भी दिक्कतें होती है। इसलिए ऐसे रूट की मंजूरी जिले के सुप्रिटेंडेट ऑफ पुलिस और अन्य अधिकारी पूरी तरह सुरक्षा की समीक्षा करने के बाद देते हैं। हालांकि कांग्रेस की इस यात्रा में यह तरीका नहीं अपनाया गया।

9. सबसे स्तब्ध कर देने वाली बात यह है कि जीरम घाट, तोंगपाल पुलिस स्टेशन और दरभा पुलिस स्टेशन के बीच स्थित है। यह इलाका दरभा से महज 7 किलोमीटर दूर है।

नक्सली हमला 25 मई को करीब शाम चार बजे के आसपास हुआ और दो घंटे तक चलता रहा। ऐसे में दरभा पुलिस चौकी को इसकी सूचना महज 15-20 मिनट में मिल गई थी। फिर भी कोई सुरक्षा बल नेताओं को बचाने घटनास्थल पर नहीं पहुंचा।

वहीं जगदलपुर घटनास्थल से 43 किलोमीटर दूर है। इसके बावजूद हमले के चार घंटे बाद सुरक्षा अधिकारी वहां पहुंचे।

10. चौंकाने वाली बात है कि नक्सलियों ने घटना के अगले दिन (26 मई) को बंद का आह्वान किया था। 17 मई को सुरक्षाबलों की कथित गोलीबारी में 8 लोगों के मारे जाने के विरोध में इस बंद को बुलाया गया था। पहले भी नक्सली विकास यात्रा और परिवर्तन यात्रा पर हमले की चेतावनी दे चुके थे। ऐसे में परिवर्तन यात्रा के दौरान सुरक्षा कड़ी करनी थी जो नहीं हुआ। वहीं विकास यात्रा के दौरान सुरक्षा चाक-चौबंद रही।

11. इन सारे सवालों को देखते हुए यह जरूरी हो जाता है कि रमन सिंह सरकार को इसका जवाब देना चाहिए। यह प्रासंगिक है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के जिम्मे ही सूबे में सभी सुरक्षा बल हैं। नक्सलियों की चेतावनी के बाद सभी राजनीतिक कार्यक्रमों को सुरक्षा देना उनकी जवाबदेही बनती है। ऐसे में इन आरोपों की सत्यता की जांच बेहद जरूरी है।
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