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नटवर सिंह की सियासी अबूझ बाजीगरी

Sun, 03 Aug 2014 09:23 PM IST
आकार पटेल/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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कभी कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे नटवर सिंह ने अपनी किताब 'वन लाइफ इस नॉट एनफ' में सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री न बनने का एक कारण बताया है। इस पर काफी विवाद हुआ।
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यहां तक कि सोनिया को कहना पड़ा कि वह भी अपनी किताब लिखेंगी। नटवर सिंह ने यह बात लिखकर क्या साबित करने की कोशिश की है।

राजस्थान में जिस भरतपुर के शाही घर में पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह का जन्म हुआ वहां केवल एक ही राजा हुआ करते थे सूरजमल जाट।

मुगल शासक औरंगजेब की मृत्यु के बाद जब मुगलों की ताकत कम हो गई तब सूरजमल ने दक्षिणी दिल्ली में कुछ जमीन हासिल कर ली। बारहा के सैयद हसन अली ख़ान (ख्यात/कुख्यात सैयद बंधुओं में एक) ने इस परिवार को राजा बनाए जाने का वादा किया।
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सोनिया गांधी पर साधा निशाना

हालांकि सैयद के पास इतने अधिकार नहीं थे और वे कुछ कर पाते, उससे पहले ही वे मारे गए। मगर जाट राजा की उपाधि पाने को बेताब थे।

सूरजमल के पिता बदन सिंह ने हारे हुए और दीवालिया गुजरात के पूर्व सूबेदार सरबुलंद खान को 5,000 रुपए भेजे, ताकि वह उन्हें अपने पत्रों में "राजा" संबोधित करें।

मगर खान ने सिंह को "ठाकुर" संबोधित करते हुए पैसे वापस कर दिए। यह 1730 के दशक की बात है।

सूरजमल ने ज्यादातर कमाई लूटपाट करके जमा की थी। वह अपने पीछे बड़ा खजाना और किसान जाटों की बड़ी फौज छोड़ गए जिनका वेतन 18 महीने से बकाया था।

कांग्रेस से क्यों हुए नाराज?

इसमें कोई ताज्जुब नहीं कि ऐसे इतिहास के वारिस भी उसी तरह के हैं।

कांग्रेस पार्टी के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे नेताओं में एक (जो इन दिनों शायद कुछ न बोलते) नटवर सिंह 83 साल की उम्र में विद्रोही बन गए हैं।

नेहरू-गांधी खानदान के साथ दशकों जुड़े रहने के बावजूद कुछ साल पहले तेल घोटाले से जुड़ी संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के बाद उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया। बाद में उनके बेटे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए।

क्या है स्कैंडल?

अब नटवर सिंह ने एक किताब लिखी है जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से चौंका देने वाला आरोप लगाया है कि साल 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की हार के बाद सोनिया गांधी भी प्रधानमंत्री बनने से डर रही थीं।

मैं स्पष्ट रूप से आरोप लगाने की बात इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मैं यह समझ नहीं पा रहा कि इसमें स्कैंडल की बात क्या है।

उन्होंने कहा, "राहुल ने अपनी मां को प्रधानमंत्री बनने से जोरदार तरीके से रोका था क्योंकि उन्हें डर था कि वह भी उनकी दादी और पिता की तरह मारी जाएंगी। यह मामला तब और गंभीर हो गया जब राहुल ने कहा कि वह अपनी मां को प्रधानमंत्री न बनने देने के लिए कोई भी कदम उठाने को तैयार हैं। राहुल एक मजबूत इच्छा शक्ति वाले व्यक्ति हैं तो यह कोई साधारण धमकी नहीं थी। उन्होंने यह फैसला करने के लिए सोनिया गांधी को 24 घंटे दिए। मनमोहन सिंह, सुमन दुबे, प्रियंका और मैं उस वक्त मौजूद थे। सोनिया को देखकर लग रहा था कि वह बेहद दुखी हैं और उनकी आंखों में आंसू थे। एक मां के तौर पर उनके लिए राहुल को नजरअंदाज करना असंभव था। इसी वजह से वह प्रधानमंत्री नहीं बनीं।"

अब सोनिया लिखेंगी किताब

इन पैराग्राफ़ में सर्वाधिक चौंकाने वाली चीज़ उनकी भाषा है। सेंट स्टीफ़ेंस और कैंब्रिज से पढ़ाई करने वाले नटवर कुछ मुहावरों पर खूब जोर देते हैं। जबकि यह चीज गरीब पत्रकारों के लिए छोड़ दी जानी चाहिए जिन्हें रोजाना तेजी से शब्दों के साथ खेलना पड़ता है और मजबूरन आसान चीजों का निरूपण करना पड़ता है।

अगर कोई बेटा अपनी मां को सुरक्षित देखना चाहता है तो इसमें ग़लत क्या है? आख़िर राहुल ने सोनिया को कौन सा अल्टीमेटम (क्या उन्होंने खाना खाने से मना कर दिया था) दिया? नटवर सिंह के पास आख़िर इस बात का क्या सबूत है कि इसी भय (अपनी अंतर्रात्मा की आवाज़ पर नहीं) से उन्होंने प्रधानमंत्री पद ठुकरा दिया? ये सारी बातें हम नहीं जानते।

लेकिन इन आरोपों को सोनिया ने गंभीरता से लिया है। इस आरोप से आज़िज होकर ही उन्होंने कहा, "मैं अपनी किताब लिखूंगी तब सबको सच्चाई का पता चलेगा। सच को सामने लाने का एक ही तरीक़ा है कि मैं लिखूं। मैं इसे लेकर गंभीर हूं।"

प्रतिक्रिया गैरजरूरी

ठीक है। महान कलाकार एलाई वॉलेक ने "दि गुड, दि बैड ऐंड दि अग्ली" में कहा है कि जब आपको किसी को मारना हो तो मार दीजिए, बात मत करिए।

क्या नटवर सिंह यह सोचते हैं कि प्रधानमंत्री पद को अस्वीकार कर सोनिया सुरक्षित हैं? या उनको धमकी देने वाले लोगों के लिए वह अब कम ताकतवर रह गई हैं? वह कांग्रेस में सबसे ताकतवर शख्स हैं। जब तक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तब भी वह भारत की सबसे शक्तिशाली शख्सियत थीं। इसे सब जानते हैं और इस पद को अस्वीकार करने का भी कोई मतलब नहीं था।

सोनिया को इस किताब पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए थी। इसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसकी वजह से उनकी प्रतिक्रिया जरूरी थी। सोनिया इस पर चुप रहतीं तो भी अच्छा होता और अगर उनकी पार्टी सत्ता में होती तो शायद यही करतीं।
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क्या होगा कांग्रेस का रुख?

राजीव गांधी की मौत के बाद सोनिया की लंबी चुप्पी और राजनीति से उनकी दूरी की वजह से ही उनकी ऐसी विश्वसनीय छवि बनी कि वह सत्ता में दिलचस्पी लेने वालों में नहीं हैं।

उन्हें इस वक़्त यह साबित करने से कुछ हासिल नहीं हुआ कि उनकी मंशा हमेशा नेक थी।

कुंवर नटवर सिंह और उनके प्रकाशक रूपा (चेतन भगत के भी प्रकाशक) ने इस वाकये का बेहद चतुराई से इस्तेमाल किया है। उनके पूर्वज उन पर गर्व कर रहे होंगे।
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