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नटवर की किताब और कांग्रेसी सियासत का सच!

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कहते हैं कि जिनके पास छुपाने के लिए बहुत कुछ होता है वे अच्छी आत्मकथा नहीं लिख पाते। सियासत की दुनिया की कई बातें हमेशा के लिए सात पर्दों में ही रह जाती हैं। इसलिए नटवर की किताब इस लिहाज से उम्मीदें जगाती हैं कि राजनीति के एक दौर का घटनाक्रम कहासुनी से आगे बढ़ कर इबारतों में दर्ज हुआ है।
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हालांकि सियासी शख्सियतों की आत्मकथाएँ पहले भी आती रही हैं पर तूफान खड़ा होने जैसी बातें बहुत कम ही हुई हैं।

आज़ादी के बाद सबसे लंबे अर्से तक सत्ता में रहने वाली कांग्रेस के अंतःपुर में झाँकने की कोशिश करती 'वन लाइफ इज नाट एनफ' पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का विश्लेषण।

समय और इतिहास

यह बात सही हो सकती है कि अब से नौ साल पहले यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी से अगर नटवर सिंह की बेहद अपमानजनक ढंग से विदाई न हुई होती तो उनकी आत्मकथात्मक किताब, 'वन लाइफ इज नाट एनफ' शायद इस रूप में सामने न आई होती।

बहरहाल, इसके प्रकाशन के पीछे कारण और कारक जो भी हों, यह किताब हमारी समकालीन राजनीति, खासतौर पर कांग्रेस के अंतःपुर के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों, विभिन्न चरित्रों की भूमिका और उनसे जुड़ी कई अनसुनी कहानियां सामने लाती है।

समकालीन भारतीय राजनीति से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं के इतिहास-लेखन की दृष्टि से भी यह एक जरूरी किताब है।

रहस्य में लिपटी

क्या इस किताब के आने से पहले खोजी पत्रकारों से लेकर विपक्षी नेताओं तक, किसी को तनिक भी इस बात का आभास था कि 2004 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री न बनने के पीछे 'असल कारण' राहुल गांधी थे!

वैसे भी हमारे देश में प्राथमिक और ठोस स्रोतों पर आधारित इतिहास-लेखन की बहुत समृद्ध परंपरा नहीं रही है। तथ्यों को सामने लाने के बजाय छुपाने की आदत आज भी बरकरार है। लंबे समय तक भारत की सत्ता पर काबिज रहे नेहरू-गांधी परिवार को लेकर देश में हमेशा उत्सुकता और जिज्ञासा रही है।

इनके अंदर की हर गतिविधि आम जनता के लिए रहस्य में लिपटी कहानी सी होती है। नटवर की किताब का एक अहम हिस्सा इस परिवार और 10, जनपथ से अपने रिश्तों पर केंद्रित है।

राजनीतिक रिपोर्टिंग

कांग्रेसियों द्वारा लेखक पर पूर्वाग्रस्त होने के आरोप लगाए जाने लगे हैं। पर हमे नहीं भूलना चाहिए कि स्वार्थ और पूर्वाग्रह कई बार नई खोज या किसी रचना की प्रेरणा भी बनते हैं।

इसीलिए अगर कोई नटवर सिंह की किताब को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी या 10, जनपथ द्वारा उनके प्रति किए अन्याय का प्रतिकार या एक तरह का प्रतिशोध कहता है तो कह सकता है पर इससे किताब का रचनात्मक मूल्य या अवदान कम नहीं होता।

किताब से इस बात का भी पता चलता है कि हमारे अखबारों-चैनलों के जरिए होने वाली राजनीतिक रिपोर्टिंग में कितनी जरूरी बातें गायब रहती हैं क्योंकि शीर्ष स्तर पर घटित घटनाक्रमों या उससे जुड़े चरित्रों तक सबकी पहुंच नहीं होती।

सोनिया का त्याग

कई बार बड़े-बड़े घटनाक्रमों की जो रिपोर्टिंग सामने आती है, वह सच न होकर बिल्कुल गढ़ी हुई कहानी होती है। इस तरह की कहानियों को गढ़ने में प्राथमिक स्रोत स्वयं ही पहल करता है ताकि असल तथ्यों से लोगों को वंचित रखा जा सके।

मसलन, सन 2004 में प्रधानमंत्री का पद अस्वीकार करने के पीछे सोनिया के त्याग की कहानी इस कदर प्रचारित हुई कि आज वह सच के रूप में दर्ज हो चुकी है। यह किताब सामने न आई होती तो समकालीन इतिहास के लेखक भी मीडिया द्वारा पेश इसी 'तथ्य' को सच के रूप में परोसते।

नटवर की किताब में ऐसे बहुत से घटनाक्रम दर्ज हैं, जिनके बहुप्रचारित-पाठ कुछ और तथ्य पेश करते हैं पर सच कुछ और है। संभव है, यह सारे सच न हों पर इनमें ज्यादातर को अभी तक सम्बद्ध पक्षों द्वारा चुनौती नहीं दी गई है।

बारू की किताब

इससे ऐन पहले संजय बारू की किताब 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टरः द मेकिंग एंड अनमेकिंग आफ मनमोहन सिंह' आई थी। वह नटवर की तरह राजनयिक-पलट-राजनेता नहीं हैं, एक पत्रकार हैं, जिन्होंने यूपीए-1 के दौर में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया-सलाहकार के रूप में काम किया।

उस किताब से भी तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय और 10, जनपथ के रिश्तों पर खास रोशनी पड़ती है। एक अन्य कांग्रेसी प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने भी अपनी आत्मकथा 'द इनसाइडर'(2000) लिखी थी पर उसमें ज्यादा कुछ नहीं था।

इससे एक बात तो साफ है कि जिनके पास बहुत कुछ छुपाने को होता है, वह अच्छी आत्मकथा भी नहीं लिख पाते।
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नटवर की कामयाबी

यह महज संयोग नहीं कि पुस्तक के प्रकाशन से पहले स्वयं सोनिया गांधी और उनकी पुत्री प्रियंका समय लेकर नटवर से मिलने उनके घर गईं।

पूरे नौ साल बाद सोनिया की नटवर से आमने-सामने की बैठक हुई। नटवर के अनुसार मां-बेटी चाहती थीं कि नटवर किताब से कुछ अंश हटा दें।

उन्हीं के मुताबिक, उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया। और किताब सामने है। नटवर की यह कामयाबी है कि अब सोनिया कह रही हैं कि वह किताब लिखकर इस किताब का जवाब देंगी। पर वह कैसे लिखेंगी और क्या लिखेंगी! शायद उनके पास बताने की कम, छुपाने की बातें ज्यादा हों।
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