मुजफ्फरनगर के अमन शर्मा से भोपाल में बनी उसकी एक महिला मित्र ने शादी करने से इंकार कर दिया तो उसने प्रेमिका की फर्जी तरीके से तैयार अश्लील फोटो फेसबुक पर अपलोड कर दी। कुछ दिनों पहले अकोला में भी एक प्रेमी ने प्रेमिका के इंकार करने के चलते उसका अश्लील एमएमएस फेसबुक पर अपलोड कर दिया।
हाल ही में केन्द्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला का फर्जी प्रोफाइल सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपलोड करने का मामला भी लोगों के जेहन से नहीं गया होगा। विभिन्न राज्यों के पुलिस थानों में इंटरनेट के जरिए ब्लैकमेलिंग, महिलाओं की निजता उल्लंघन और धोखाधड़ी के मामलों की भरमार लग गई है। मगर देश की सूचना तकनीक कानून में ऐसे सख्त प्रावधान ही नहीं है, जो कि साइबर दबंगई के मारों को न्याय दिला सकें।
साइबर अपराध के लिए देश में एकमात्र आईटी कानून है। लेकिन आईटी अधिनियिम में 2008 के संशोधन के बाद इस कानून को भी दंतहीन बना दिया गया। साइबर कानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल ने अमर उजाला को बताया कि 2008 में संशोधन के बाद सिर्फ तीन मसलों को छोड़कर सभी तरह के साइबर अपराधों को जमानती बना दिया गया। जबकि 2002 के मूल कानून में ज्यादातर अपराध गैर जमानती थे।
अब सिर्फ साइबर आतंकवाद, बच्चों की पोर्नोग्राफी और निजता का उल्लंघन जैसे तीन मसले ही गैर जमानती अपराध की श्रेणी में आते हैं। ऐसे में साइबर अपराध से जुड़े मामलों में अभियुक्तों को जमानत मिल जाती है और वह जमानत पर छूटने के बाद इलेक्ट्रानिक सबूत को नष्ट कर देते हैं। लिहाजा वह दोषी साबित नहीं हो पाते। साइबर विशेषज्ञ कहते हैं कि ज्यादातर पुलिसकर्मी भी इस तरह के मामलों को निपटने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं। वह साइबर अपराध की जांच आम अपराधों की तरह करते हैं, जिससे उनको सफलता नहीं मिल पाती।
सिर्फ तीन मामलों में हुई सजा
पुलिस की लचर जांच का सबसे बड़ा सबूत है कि देश में 1995 में इंटरनेट आने के बाद से अब तक साइबर अपराध के तीन सिर्फ मुकदमों में ही सजा हो पाई है। पुलिस की कोताही का सबसे बड़ा नमूना तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी पेश करते हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक 2010 में पूरे देश में सिर्फ हजार के करीब साइबर अपराध दर्ज किए गए हैं। जबकि अखबारों में रोजाना इस तरह के मामलों की रिपोर्टिंग देखी जा सकती है।
कैसे बरतें सावधानी
विशेषज्ञ कहते हैं कि साइबर बुलिंग और ब्लैकमेलिंग के मामलों में ज्यादातर देखा गया है कि पीड़ितों के करीबी ही इस तरह के काम को अंजाम देते हैं। इसलिए इंटरनेट यूजर्स को सर्फिंग करते वक्त अपनी पहचान को पूरी तरह से गुप्त और सुरक्षित रखना चाहिए। उनको अपना पासवर्ड छिपा कर रखना चाहिए। वहीं अभिभावकों को भी इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले अपने बच्चों पर नजर रखनी चाहिए। साथ ही बच्चों को साइबर अपराध के खतरों से भी अवगत कराना चाहिए।