फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अंतिम सांस तक नहीं मिल पाई हिंदुस्तान की नागरिकता

Fri, 02 Nov 2012 08:50 AM IST
मुरादाबाद/ब्यूरो
विज्ञापन
विज्ञापन
हिंदुस्तान की सरजमीं पर पैदा हुए, उनकी हर बात में भारतीय संस्कृति की झलक दिखाई देती। लेकिन विडंबना यह है कि वह कभी हिंदुस्तानी नहीं बन पाए। विभाजन के वक्त उन पर पाकिस्तानी होने की जो मोहर लगी, उसे मिटाने के लिए सालों अधिकारियों के चक्कर लगाते रहे और आखिर में दुनिया छोड़ गए।
विज्ञापन


यही दर्द भरी दास्तां है नागफनी के डहरिया मोहल्ला निवासी 80 साल के सैयद नसीमुद्दीन की। पूर्व विधायक राहत मौलाई के छोटे भाई सैयद नसीमुद्दीन ने उम्र के 60 बसंत मुरादाबाद में ही गुजारे। विभाजन के वक्त करीब 18 साल की उम्र में वह पाकिस्तान गए थे। उसके बाद से उनकी पहचान पाकिस्तानी नागरिक की हो गई।

नहीं मिली हिंदुस्तान की नागरिकता
देश से बिछड़ने का गम उन्हें सताता रहा और सन 1970 में वह वीजा लेकर लौट आए। तब से नसीमुद्दीन अपने पैतृक घर में ही रह रहे थे। लौटकर उन्होंने रुख्साना बेगम से शादी की। तीन बेटे कासिफ, साकिब और दानिश हुए। इसी दौरान उन्होंने हिंदुस्तानी नागरिकता के लिए आवेदन किया। लेकिन विडंबना है कि लखनऊ से लेकर केंद्र तक सैकड़ों चक्कर लगाने के बावजूद उन्हें नागरिकता नहीं मिली।
विज्ञापन


'हिंदुस्तान से ही प्रेम करते थे'
सरकार उन्हें पांच-पांच साल के लांग टर्म वीजा (एलटीवी) पर भारत में रहने की इजाजत देती रही, लेकिन हिंदुस्तानी होने का गौरव नहीं मिला। गुरुवार को नसीमुद्दीन की बीमारी के चलते मौत हो गई। उनके भतीजे असद मौलाई ने बताया कि पाकिस्तान से आने के बाद चचा का कभी भी वहां जाने का मन नहीं किया। वह हिंदुस्तान से ही प्रेम करते थे और इसी मुहब्बत में चल बसे।
विज्ञापन

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें