एक तरफ भाजपा ने चुनाव से ठीक पहले अलग तेलंगाना के गठन की कवायद को राजनीति से प्रेरित बताया है, वहीं उसने अपनी तरफ से अलग विदर्भ राज्य का मसला उठा दिया है।
महाराष्ट्र से विदर्भ क्षेत्र को अलग करने की मांग भी दशकों पुरानी है। कई बार विदर्भ के लिए आंदोलन हुए हैं। बल्कि तेलंगाना के मुकाबले अलग विदर्भ की मांग ज्यादा पुरानी है। विदर्भ क्षेत्र में नागपुर, भंडारा, गढ़चिरोरी, चंद्रपुर, अमरावती, यवतमाल अकोला जैसे जिले शामिल है।
1953 में फजल कमेटी ने कहा था कि तेलंगाना और विदर्भ को अलग राज्य के रूप में सामने लाना चाहिए। आंदोलन दोनों इलाकों में हुए। पर शायद तेलंगाना की धार मजबूत रही।
अब तेलंगाना के लिए लोकसभा और राज्यसभा में प्रस्ताव पास होने के बाद भाजपा के एक पूर्व सांसद ने फिर अलग विदर्भ की बात उठाई है। उनका कहना है कि यहां तो हेदराबाद की तरह राजधानी की भी समस्या नहीं। दूसरी अ़ड़चने भी नहीं है।
शिवसेना ने ठेंगा दिखाया
यहां दिलचस्प यह है कि शिवसेना तो अलग विदर्भ के पक्ष में नहीं रही, लेकिन महाराष्ट्र के इस क्षेत्र को भाजपा अपने अनुकूल देखती है। साथ ही भले कांग्रेस एनसीपी के नेता खुलकर न कहें लेकिन उन्हें भी अंदर ही अंदर लगता है कि महाराष्ट्र में रहते हुए विदर्भ के राजनीतिक हैसियत उतनी नहीं बन पाती।
भाजपा ने अलग विदर्भ का स्वर तो छेड़ा है लेकिन उसकी सहयोगी पार्टी इस मामले में सहयोग नहीं करती। शिवसेना महाराष्ट्र के किसी भी विभाजन को रोकने के लिए अलग छोटे राज्यों के खिलाफ रहती हैं।
इसी नाते शिवसेना के नेता उद्धव ठाकरे ने अलग तेलगांना का विरोध किया था। अब जब भाजपा ने अलग विदर्भ का राग फिर छेड़ा है, तो शिवसेना ने कोई प्रतिक्रिया नही की है।
केजरीवाल के लिए रागिनी
हरियाणा की राजनीति रागिनी से भी सजती है। रागिनी राजनीतिक माहौल में जोश भरती है। इसमें नेता के लिए प्रशंसा के शब्द कहे जाते हैं। हरियाणा के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में एक दो रागिनी जरूर सुनने को मिल जाती है।
केजरीवाल की हरियाणा की पहली सभा शुरू होने से पहले हारमोनियम लेकर परंपरागत पोशाक में कई कलाकार रागिनी गाते हुए दिखे। पहले तो यही लगा कि ये शायद कोई हरियाणा की परंपरागत रागिनियों को गाएंगे। लेकिन उनकी रागिनी में केजरीवाल की प्रशंसा थी कि हरियाणा तूने कैसा लाल जन्मा।
यही नहीं नेताओं ने भी शायद इन भावों को महसूस कर दिया। तभी मनीष सिसोदिया ने रागिनी में न सही, भाषण में इस बात को कह दिया कि हरियाणा की धरती ने कैसा छोरा जन्मा। हरियाणा में अब चुनाव तक 'आप' की रागिनी खूब सुनाई देगी।
मोदी कबीला
नरेंद्र मोदी अपने भाषण की शुरुआत किसी क्षेत्र की किसी खासियत से करते हैं, और उस क्षेत्र से अपने को और गुजरात को किसी न किसी तरह जोड़ने की कोशिश करते हैं। मतदाताओं को अपनी ओर लुभाने का यह एक अंदाज है।
अरुणाचल में तो उन्होंने न केवल मोदी कबीले को गुजरात से जोड़ दिया बल्कि एक खास चिड़िया की टोपी प्रतीक के तौर पर भी पहन ली। मोदी ने पूरे भाषण में इस खास टोपी को उतारा नहीं। वैसे ही भाषण देते रहे।
अरुणाचल प्रदेश में बस इतना काफी था कि एक कबीले का नाम मोदी कबीला है। उन्होंने कह दिया कि जरूर इस यह मोदी कबीले के पूर्वज गुजरात से आए होंगे, तभी उनके नाम के साथ मोदी कबीला जुड़ा है। मोदी कबीले पर करीब सात मिनट बोले। राजनीति का यह भी एक हुनर है।
एक पंच यह भी
अरुणाचल प्रदेश में चिड़िया की इस टोपी को पहले भी नेताओं को पहनाया गया होगा। पर इसे पहन कर पूरा भाषण।
राजनीति का एक पंच यह भी है कि वह यह याद कराना नहीं भूले कि द्वारिका के कृष्ण ने यहां आकर रुक्मणि से शादी की थी।
यानि संबंधों को जताने के लिए मोदी कबीला, चिड़िया वाली टोपी और रुकमणि- कृष्ण विवाह हर पहलु पर जाएंगे।
राज ठाकरे की प्रशंसा
मनसे नेता राज ठाकरे भाजपा के नेता की प्रशंसा करेंगे और वह भी चुनाव से ठीक पहले तो कुछ रहस्य सा लग सकता है। राज ठाकरे ने नासिक में गौंडा पार्क परियोजना में नितिन गडकरी की खुली प्रशंसा की। साथ ही प्रमाण पत्र भी दिया कि लोकनिर्माण मंत्री रहते हुए उन्होंने इस क्षेत्र में बहुत शानदार काम किया।
गडकरी 1995 से 1999 तक राज्य में इस विभाग के मंत्री थे। अब यह न सोचिए कि राज ठाकरे और भाजपा के बीच कोई गहरी मंत्रणा चल रही है या फिर चुनाव बाद के लिए दोनों पक्ष साफ्ट हो रहे हैं।
बात बस इतनी है कि यहां नगर निगम में मनसे सत्ता में है। मनसे की सत्ता भाजपा के सहयोग से बनी है। इसलिए इस क्षेत्र मे राज ठाकरे को मनसे की तारीफ करने में कोई दिक्कत नहीं है।
आइए पत्रकारजी
राहुल गांधी देहरादून की जनसभा को संबोधित करने गए।
राज्य में नए मुख्यमंत्री हरीश रावत की पूरी कोशिश थी कि इस जनसभा को सफल बनाकर यह संकेत दिया जाए कि छाया हुआ कोहरा दूर हो चुका है। लोगों में फिर से कांग्रेस के प्रति विश्वास बनने लगा है।
राहुल की जनसभा को सफल बनाने के लिए हर तरह की कोशिश की गई। लेकिन कांग्रेस के जरिए कुछ चुनिंदा पत्रकारों को राहुल से मिलवाने की घटना भी आम हो गई। इन चंद पत्रकारों को राहुल से इस तरह मिलवाया गया कि कानोंकान किसी को खबर न हो। इसका एंजेडा भी सामने नहीं आया।
मुलाकात के गवाह
चुनाव से पहले बड़े नेता आमतौर पर पत्रकारों से मिलते हैं। इसमें नेता राय मशविरा करते हैं। लेकिन उस दोपहर साढे ग्यारह बजे की यह मुलाकात आम मुलाकात की तरह नहीं थी। इसमें बहुत चुनिंदा पत्रकार थे। इन पत्रकारों में कुछ पत्रकार तो इस समय किसी मीडिया संस्थान से जुड़े भी नहीं है।
कुछ पत्रकार तो इस समय फ्री लांसिग भी नहीं कर रहे हैं। लेकिन राज्य कांग्रेस के नेता मानते हैं कि इन पत्रकारों का कुछ रुतबा है। इसलिए राहुलजी के साथ उनकी खास मुलाकात कराई गई।
अब राजधानी में यही चर्चा है कि यह कैसी मुलाकात थी जिसमें क्या कहा गया और क्या सुना गया किसी को पता नहीं चला। बस चंद बड़े कांग्रेसी और खास पत्रकार इस छोटी मगर खास मुलाकात के गवाह बने।