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'भूमि बिल' पर और बढ़ी मोदी की मुश्किल

Thu, 19 Mar 2015 09:25 AM IST
एम संजय/नई दिल्ली
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भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल को लेकर भंवर में फंसी केंद्र सरकार की संयुक्त सत्र बुलाकर बिल पास कराने की रणनीति में भी नई चुनौती आ खड़ी हुई है। लोकसभा में बिल पर मतदान के दौरान शिवसेना का विरोध में वॉकआउट करने के बाद इसकी मुखालफत करने के ऐलान ने सरकार की मुश्किल बढ़ा दी है।
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इस वजह से संयुक्त सत्र के जरिए भी बिल को पारित कराना संख्या बल के लिहाज से चुनौती है। शिवसेना के विरोध के चलते संयुक्त सत्र में बिल को पारित कराने के लिए सरकार को अन्नाद्रमुक पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसीलिए सरकार के रणनीतिकार संयुक्त सत्र का रास्ता अपनाने को लेकर बैकफुट पर हैं।

सरकार के रणनीतिकार भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल पर परदे के पीछे संख्या बल का जुगाड़ करने में जुटे हैं। संयुक्त सत्र बुलाने से पहले बिल में और सुधार कर राज्यसभा में बहुमत जुटाने की है। इस प्रयास में सरकार की ओर से कहा गया है कि राज्यसभा में बिल लाने से पहले वह और बदलाव कर सकती है। संयुक्त सत्र को सरकार अंतिम विकल्प के रूप में देख रही है क्योंकि वहां भी संख्या बल के मामले में शिवसेना ने उसका गणित गड़बड़ा दिया है।
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अन्नाद्रमुक पर भाजपा को भरोसा नहीं

संयुक्त सत्र के लिए सरकार को दोनों सदनों की संख्या के आधे यानी 395 मतों की जरूरत है। लोकसभा के 545 और राज्यसभा के 245 सदस्यों को जोड़कर दोनों सदनों के सदस्यों की कुल संख्या 790 बैठती है। मगर शिवसेना के सांसदों की संख्या सरकार से हटा दें तो सहयोगियों के साथ सरकार के पास दोनों सदनों के सांसदों की संख्या 377 बनती है।

बताया जा रहा है कि शिवसेना के रुख में अब तक बदलाव नहीं आया है। ऐसी स्थिति में संयुक्त सत्र के जरिए भूमि बिल को पारित कराने के लिए मोदी सरकार को पूरी तरह अन्नाद्रमुक पर निर्भर रहना पड़ सकता है। अन्नाद्रमुक के पिछले अनुभव सरकार के रणनीतिकारों को ऐसा करने से रोक रहे हैं।

साल 2013 में यूपीए सरकार के भूमि बिल का विरोध करने वाली अन्नाद्रमुक ने लोकसभा में बेशक मोदी सरकार के बिल का समर्थन किया है। मगर 1999 के खट्टे अनुभव को देखकर सरकार के रणनीतिकार जयललिता पर निर्भर नहीं रहना चाहते हैं। तब अन्नाद्रमुक की वजह से ही अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार 1 वोट से विश्वास मत हार गई थी।

सोनिया ने लिखा अन्ना को पत्र

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पत्र लिखकर राजग सरकार के भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल पर समाजसेवी अन्ना हजारे की चिंताओं से सहमति जताई है। साथ ही उन्होंने इस बिल का हर स्तर पर विरोध करने की भी बात कही।

कांग्रेस अध्यक्ष ने मंगलवार को यह पत्र हजारे के पिछले पत्र के जवाब में लिखा, इसमें उन्होंने भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल के खिलाफ 14 दलों के साथ राष्ट्रपति भवन तक विरोध मार्च का भी जिक्र किया है। सोनिया ने अपने पत्र में लिखा है कि आपका पत्र 14 मार्च को मिला, जिसमें आपने राजग सरकार के भूमि अधिग्रहण बिल की चर्चा की और अपनी आशंकाएं जताई हैं। मैं आपकी बातों से पूरी तरह से सहमत हूं कि राजग सरकार का अध्यादेश और संशोधन बिल किसानों के हित में नहीं है।

कांग्रेस द्वारा बिल का हर मोर्चे पर विरोध किए जाने की बात दोहराते हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने बिल के खिलाफ विपक्षी दलों के राष्ट्रपति भवन तक मार्च का भी उल्लेख किया है। सोनिया ने लिखा कि मैं आपको आश्वस्त करना चाहती हूं कि इस मसले पर हमारी लड़ाई जारी रहेगी।

प्रवर समिति ने बिना बदलाव के बिलों को दी मंजूरी

खान व खनिज संशोधन बिल और कोयला खदान अध्यादेश संशोधन विधेयक के लिए गठित राज्यसभा की प्रवर समिति ने दोनों बिलों को बिना किसी बदलाव के मंजूरी दे दी है। राज्यसभा में बुधवार को पेश की गई रिपोर्ट का कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने तीखा विरोध किया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि समितियों ने विपक्षी दलों के सदस्यों की बात पर गौर किए बिना जल्दबाजी में रिपोर्ट तैयार की। विपक्ष के कड़े तेवरों के चलते सरकार के लिए इन दोनों विधेयकों को पारित कराना आसान नहीं होगा।

इस मुद्दे पर मचे हंगामे के चलते राज्यसभा की कार्यवाही दस मिनट के लिए स्थगित करनी पड़ी। उपसभापति और सरकार ने विपक्ष को यह कह कर शांत किया कि वह अपना पक्ष बिल पर बहस के दौरान रखें। सरकार आर्थिक सुधारों से जुड़े इन दो अहम बिलों को बृहस्पतिवार और शुक्रवार को राज्यसभा में बहस के लिए पेश कर सकती है। अगर उच्च सदन से दोनों बिलों को मंजूरी नहीं मिली तो इन्हें पास कराने के लिए सरकार संसद का संयुक्त सत्र बुला सकती है। लोकसभा पहले ही इन दोनों बिलों को पारित कर चुकी है।

कांग्रेस के दिग्विजय सिंह, राजीव शुक्ला व पी भट्टाचार्य और डीएमके के तिरुचि शिवा तथा माकपा के एन बालगोपाल ने कोयला बिल रिपोर्ट पर अपना असहमति पत्र (डिसेंट नोट) दर्ज कराया है। प्रवर समिति ने बिलों में कोई बदलाव नहीं करते हुए खनन के पर्यावरण पर प्रभाव, गैरकानूनी खनन, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास जैसे मुद्दे पर सरकार को ध्यान देने की सिफारिश की है। बुधवार सुबह रिपोर्ट के पेश होते ही सदन में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने इसका विरोध किया। उनके मुताबिक, समिति ने सदस्यों को भरोसे में लिए बिना कोई भी बदलाव नहीं करने का फैसला ले लिया।

गौरतलब है कि सरकार इन दोनों बिल को बजट सत्र के पहले चरण में ही पास कराना चाह रही है। हालांकि सरकार के लिए राहत की बात यह है कि विपक्षी खेमे की राजनीति कर रही तृणमूल कांग्रेस इन दोनों बिलों पर सरकार के साथ है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ कहा है कि ये दोनों बिल राज्यों के हित में हैं क्योंकि नए कानून से राज्यों का राजस्व बढ़ेगा। बीजू जनता दल भी इसी वजह से इन दोनों बिलों के समर्थन में है।
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आम बजट पर चर्चा को लेकर भाजपा-कांग्रेस में नोकझोंक

आम बजट पर चर्चा को लेकर राज्यसभा में सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हुई। विपक्ष ने सरकार पर जनता को धोखा देने का आरोप लगाया। कांग्रेस ने कहा कि जनता ने भरोसा करके भाजपा को बहुमत दिया मगर बदले में सरकार ने जनता को टैक्स और सामाजिक क्षेत्र के विकास में कटौती इनाम में दी। कांग्रेस ने सरकार पर महिला, बाल और शिक्षा क्षेत्र में पैसे की कटौती का आरोप लगाकर देश के विकास को अवरुद्ध करने की बात कही। विपक्ष ने कहा कि सरकार जनता को जहर की राजनीति परोस रही है। विकास के नाम पर सांप्रदायिक तनाव और धर्म परिवर्तन का जहर दिया जा रहा है। वहीं सत्तारूढ़ भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा कि अगर सरकार बजट में अमृत भी डाल देती तो विपक्ष इसे जहर ही बताता। भाजपा ने कहा कि मोदी सरकार ने युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक के भविष्य का ख्याल रखकर बीमा और पेंशन की पूरी व्यवस्था की है।

कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने कहा कि मोदी सरकार के नौ महीने में ही देश में निवेश, व्यापार और प्रगति का माहौल खराब हो गया है। मौजूदा बजट से हालत और खराब हो गई है। निर्यात काफी घट गया है जबकि पूंजी निर्माण में भी क्षति हुई है। उन्होंने कहा कि उद्योगों को कर्ज नहीं दिया जा रहा है तो विनिर्माण का क्षेत्र सुस्त हो गया है।

शर्मा ने कहा कि इस सरकार ने जनता के साथ धोखा किया। उन्होंने सवाल उठाया कि पेट्रोल और डीजल के अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम घटे मगर इसका फायदा जनता को नहीं दिया गया। जबकि ऊपर से सीमा शुल्क लगा दिया गया। सरकार अपनी तिजोरी भर रही है लेकिन जनता की जेब काट रही है। वहीं भाजपा की ओर से प्रभात झा ने कहा कि मोदी सरकार ने युवाओं और गरीबों के भविष्य की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक रुपये में बीमा की सुविधा देने की बात कही है। साथ ही अटल पेंशन योजना से बुजुर्गों को फायदा होने जा रहा है।
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