सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की एक तस्वीर अक्सर शेयर की जाती है। दोनों प्रधानमंत्रियों की रोचक तुलना करती तस्वीर में मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री 'साइलेंट मोड' में होते हैं और नरेंद्र मोदी 'फ्लाइट मोड' में।
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तस्वीर में किया गया तंज दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल की हकीकत रहा है। उन्होंने पिछले वर्ष 26 मई को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और मात्र 21 दिनों बाद पहली विदेश यात्रा पर निकल गए। 16 जून और 17 जून को उन्होंने भूटान की यात्रा की।
भूटान से लौटने के महीने भर से भी कम दिनों में वे चार दिवसीय यात्रा पर ब्राजील चले गए। 2014 की बात करें तो अक्टूबर और दिसंबर महीने को छोड़कर प्रधानमंत्री ने हर महीने विदेश यात्रा की।
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2015 में भी वे 6 मुल्कों की यात्रा कर चुके हैं। अगले सप्ताह मोदी चीन, मंगोलिया ओर दक्षिण कोरिया की पांच दिवसीय यात्रा पर जा रहे हैं। मोदी की विदेश यात्रा को आंकड़ों में तब्दील करें तो पाएंगे कि वे 348 दिनों में तकरीबन 40 दिन विदेशों में रहे।
क्या यूपीए से बेहतर है राजग की विदेश नीति?
मोदी की विदेश यात्राओं की अक्सर आलोचना होती रही। मार्च और अप्रैल महीने में फसलों की बर्बादी के कारण कई किसानों ने आत्महत्या की, उस समय कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी की विदेश यात्राओं पर हमलावर होते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को विदेश यात्राओं के बजाय मंडियों का दौरा करना चाहिए।
आलोचनाएं अपनी जगह हैं फिर भी सवाल उठता है कि मोदी की विदेश यात्राओं से मुल्क की साख बढ़ी या ये यात्राएं वैश्विक नेताओं के साथ निजी संपर्क बेहतर करने तक ही सीमित रहीं?
जानकारों की मानें तो यूपीए सरकार की तुलना में राजग सरकार की विदेश नीति कई मायनों में अलग रही। प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश मंत्रालय का प्रभार सुषमा स्वराज को सौंपा। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद सुषमा स्वराज पहली ऐसी महिला रही हैं, जिन्होंने विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली।
मोदी सरकार ने पड़ोसी मुल्कों के साथ संबंध बेहतर करने की दिशा में पहल की। पड़ोस का विस्तार करने के लिए पूर्वी एशियाई मुल्कों के साथ भी संबंध बेहतर करने का प्रयास किया।
पड़ोसियों संबंध सुधारने के दिशा में किया बेहतर काम
मोदी सरकार की विदेश नीति के मसले पर चीनी मामलों के विशेषज्ञ और जानमाने पत्रकार विजयक्रांति का कहना है कि पिछले कई सालों से पड़ोसी मुल्कों के साथ रिश्तों को लेकर सरकार उदासीन थी। उन मुल्कों के साथ रिश्ते बेहतर करना सरकार के लिए चुनौती हो गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में बेहतर काम किया।
उल्लेखनीय है कि नरेंद्र मोदी ने सार्क देशों के साथ संबंध बेहतर करने की शुरुआत प्रधनमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही शुरू कर दी थी।
नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह मे सार्क के सभी देशों के प्रमुखों को आमंत्रित किया। पहली बार पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भारतीय प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह का हिस्सा बने।
पाकिस्तान से रिश्ते कभी नरम तो कभी गरम
हालांकि पाकिस्तान के भारत के रिश्ते 'कभी नरम तो कभी गरम' रहे। सितंबर में कश्मीर में आई बाढ़ से पाकिस्तान भी प्रभावित रहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आपदा के वक्त पाकिस्तान को मदद की पेशकश की। और जब पाकिस्तान ने कश्मीर अलगाववादियों से नजदीकी दिखाने की कोशिश की तो भारत ने सचिव स्तर की वार्ता रोक दी।
भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर गोलीबारी की वारदात छिटपुट ढंग से पूरे साल चलती रही। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को कई बार ललकारा था, प्रधानमंत्री के रूप में वे अधिकतम शांत रहे।
नरेंद्र मोदी ने शांति काल के दिनों मे तो पड़ोसियों के साथ रिश्ते बेहतर करने की कोशिश की, अपादाओं के वक्त भी उन्होंने बढ़कर सहयोग किया। मोदी के इस रवैये से विदेशों में भारत की साख पुख्ता हुई।
नरेंद्र मोदी ने चीन के साथ रिश्ते सुधारने से ज्यादा संतुलित करने की दिशा में काम किया। विजय क्रांति के मुताबिक, चीन का नाम आते ही भारतीय नेताओं की घिग्घी बन जाती थी। नरेंद्र मोदी उस भय को खत्म किया। उन्होंने जापान, वियतनाम, ऑस्ट्रेलिया जैसे मुल्कों से रिश्ते बेहतर कर चीन को घेरने का प्रयास किया।
पिछले वर्ष चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत की यात्रा की थी।
विजयक्रांति ने के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन को स्पष्ट संदेश दिया किया वह भारतीय सीमा में अपनी सेना की घुसपैठ रोके। घुसपैठ के साथ दोनों मुल्कों के रिश्ते बेहतर नहीं किए जा सकते। हालांकि चीन ने भारत के आक्रामक रुख का जवाब पाकिस्तान के साथ नजदीकी दिखाकर देने की कोशिश की है।