शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रिटेन की तीन दिनों की यात्रा समाप्त हुई। यहां उनका एक सुपर स्टार जैसा स्वागत किया गया। ब्रितानी संसद में भाषण देने वाले वो पहले भारतीय प्रधान मंत्री बने।
ब्रिटेन की रानी के बकिंघम पैलेस में खाना खाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री का सेहरा भी उन्हीं के सर गया। ब्रितानी प्रधान मंत्री डेविड कैमरन की आव भगत ने उनका क़द ऊंचा किया।
सही मायने में इतना बढ़िया स्वागत और इतनी ज़बरदस्त गर्मजोशी से कोई भी सपनों की दुनिया में खो सकता है। लेकिन सपनों की दुनिया के बाहर असल ज़िंदगी घर वापसी पर उनका इंतज़ार कर रही है।
बिहार की हार का शोर फिर सुनाई देगा?
शायद मोदी सोच रहे होंगे कि ये दौरा तुरंत क्यों ख़त्म हो गया, क्योंकि
बिहार विधान सभा चुनाव का सुपर स्टार बनने की उनकी कोशिश बुरी तरह नाकाम
रही। इसकी जवाबदेही उन्हीं की होगी क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने उन्हीं
के नाम पर चुनाव लड़ा था।
दूसरी तरफ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की
बग़ावत की आवाज़ उनके कानों में अब भी गूँज रही होगी। दिल्ली वापस जाने पर
ये आवाज़ तेज़ होने वाली है। वेम्बली स्टेडियम की धूमधाम और चमक-दमक का
असर घर जाते ही ख़त्म हो जाएगा।
उनके आलोचक एक बार फिर उनसे ये
सवाल पूछेंगे कि विदेश की यात्राएं कम करके देश की बढ़ती समस्याओं पर ध्यान
क्यों नहीं देते। लोग उनसे कहेंगे कि असहिष्णुता के बढ़ते माहौल के
विरुद्ध वेम्बले और मैडिसन स्क्वेयर गार्डन जैसे तेज़ आवाज़ वाले बयान
क्यों नहीं देते?
ब्रिटिश मीडिया ने मोदी से किए चुभते सवाल
लेकिन तीन दिनों की ब्रितानी यात्रा के दौरान भी सब कुछ मोदी के मन के मुताबिक़ नहीं था। डेविड कैमरन के साथ साझा प्रेस कॉन्फेरेंस के दौरान उनसे ब्रिटिश मीडिया ने चुभते हुए सवाल किए।
यहां तक कि गुजरात दंगों का भी हवाला दिया जो मोदी को बिलकुल पसंद नहीं। इसके बाद जब वो गांधी की प्रतिमा पर फूल चढ़ा रहे थे तो नेपाली, कश्मीरी और पंजाबी समुदाय के लोग उनके ख़िलाफ़ नारे लगा रहे थे।
भारत में उनके आलोचक भी उन्हें इज़्ज़त के दायरे में बुरा भला कहते हैं लेकिन यहाँ तो 'मोदी हत्यारा' और 'मोदी आतंकवादी' जैसे नारे लग रहे थे।
ज़्यादातर भारतीय मीडिया उनके दूसरे विदेशी दौरों की तरह केवल उनकी धूम धाम और प्रवासी भारतीयों में उनके बढ़ते हुए क़द की बातों पर फोकस कर रही थी लेकिन ब्रिटिश मीडिया उन्हें बख़्शने के मूड में नहीं थी।
गार्डियन ने मोदी के दौरे को बताया 'ओवर द टॉप'
'गार्डियन' अख़बार ने अपने एक ताज़ा संपादकीय में कहा है कि मोदी का दौरा ओवर द टॉप या ज़रूरत से अधिक चर्चित था।
'इंडिपेंडेंट' अख़बार ने लिखा कि गुजरात दंगों का ज़िम्मेदार कोई भी हो, ये मारकाट हुई तो उन्हीं के राज में। (वो उस समय एक साल पहले ही गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे)।
कई अख़बारों ने डेविड कैमरन को इस बात के लिए आड़े हाथों लिया कि वो प्रधानमंत्री मोदी की खुशामद पर क्यों उतर आए थे।
बुद्धिजीवियों और मानव अधिकार की संस्थाओं ने कहा कि डेविड कैमरन को चाहिए कि नरेंद्र मोदी से वो पूछें कि उनके देश में असहिष्णुता की बढ़ती घटनाएं क्यों हो रही हैं? लेकिन इन में से कोई सड़कों पर मोदी विरोधी प्रदर्शनों में शामिल नहीं हुआ।
9 अरब पाउंड के व्यापार पर रजामंदी
जहां भारतीय मूल के आम लोग और भारतीय मूल के ब्रितानी सांसद मोदी के आने पर जोश में दिखाई दे रहे थे वहीं ब्रिटेन की स्थानीय जनता पर उनके दौरे का कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा।
उनके लिए इसमें केवल जिज्ञासा से अधिक कुछ और नहीं था, लेकिन दोनों नेताओं के बीच गंभीर बातें भी हुईं।
असैनिक परमाणु समझौते जैसे समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए गए। ब्रिटेन ने भारत में तीन स्मार्ट शहरों के निर्माण का सौदा भी किया और दोनों देशों के बीच 9 अरब पाउंड के व्यापार पर रज़ामंदी भी हुई। दोनों देशों के रिश्तों में एक नई जान फूंकने की ज़रूरत थी।
इस दौरे से इस रिश्ते में एक नई जान आ सकती है लेकिन यहाँ आलोचक कहते हैं ये उपलब्धियां शोर शराबे के बग़ैर भी हासिल की जा सकती थीं।