अमेरिकी राजदूत नैंसी पॉवेल को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के लिए दो महीने इंतजार करना पड़ा।
नैंसी की गुजरात के सीएम से चर्चित मुलाकात आखिरकार बृहस्पतिवार 13 फरवरी को संभव हो पाई। हालांकि पॉवेल ने बीते साल दिसंबर के दूसरे हफ्ते में ही विदेश मंत्रालय के समक्ष मोदी से मुलाकात की व्यवस्था कराने का आग्रह किया था।
मंत्रालय ने राजनीतिक नेतृत्व से मुलाकात कराने की हरी झंडी मिलने के बाद ही इस महीने के पहले हफ्ते में गांधीनगर स्थित मुख्यमंत्री कार्यालय से संपर्क साधा। इस दौरान राजनीतिक नेतृत्व इस मुलाकात के कारण होने वाले सियासी नफा नुकसान का आकलन करता रहा।
दरअसल लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अमेरिका की ओर से मोदी के साथ शुरू होने वाली सुलह सफाई सरकार को रास नहीं आई। यही कारण है कि मुलाकात तय हो जाने के बाद खुद विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद सार्वजनिक रूप से अमेरिका को नसीहत देते देखे गए।
खत्म हुआ 9 साल का बहिष्कार
उल्लेखनीय है कि आम चुनाव के बाद भारत की राजनीतिक परिस्थितियों में संभावित बदलाव के आसार से चौकन्ने अमेरिका ने बीते 9 साल से जारी मोदी के बहिष्कार को खत्म करने और उनसे मेलजोल बनाने की रणनीति बनाई।
विदेश मंत्रालय के अति विशिष्ट सूत्र ने बताया कि पॉवेल की ओर से मोदी से मुलाकात की व्यवस्था कराने का आग्रह दो महीने पहले ही मंत्रालय को भेजा गया था। हालांकि दूसरे देशों के राजदूतों का इस तरह का आग्रह एक सामान्य प्रक्रिया है, मगर यह मामला थोड़ा अलग था।
उल्लेखनीय है कि आमतौर पर मंत्रालय दूसरे देशों के राजदूतों की देश की किसी हस्ती से मिलने की व्यवस्था कराने के आग्रह पर अपने स्तर पर निर्णय लेता आया है।
नैंसी के कदम से सरकार हैरान
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अमेरिकी राजदूत के मोदी से मिलने की इच्छा जताने से सरकार हैरान थी। जाहिर तौर पर सरकार को लगा कि चुनाव से पहले होने वाली यह मुलाकात भाजपा और मोदी को सियासी लाभ दे सकती है।
यह मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण थी कि अमेरिका ने उसी गुजरात दंगे के बहाने मोदी को वीजा देने से मना किया था, जिसके आधार पर विभिन्न राजनीतिक दल आज तक मोदी को घेरते आए हैं।
इस चुनाव में भी राजग विरोधी सभी दल गुजरात दंगे के सवाल पर ही मोदी और भाजपा को घेरने में जुटे हैं। ऐसे में अमेरिका का मोदी का 9 साल पुराना बहिष्कार ठीक चुनाव से पहले खत्म करने का फैसला इन दलों के लिए असहज स्थिति उत्पन्न कर रहा है।
यही कारण है कि मुलाकात तय होते ही सपा ने जहां अमेरिका पर भारत के अंदरूनी मामलों में दखल देने का आरोप लगाया, वहीं खुद विदेश मंत्री ने अमेरिका को गुजरात दंगों की याद दिलाने में देरी नहीं की।