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रहस्य बनी बनारस की 'शाही सुरंग', क्या खुलेगा राज?

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वाराणसी शहर के लिए पहेली बने ‘शाही नाला’ की भौतिक स्थिति के अध्ययन, बाधाओं को चिह्नित करने के साथ ही उसके जीर्णोद्धार की पहल शुरू हो गई है। मुगलकाल के दौरान ‘शाही नाला’ को ‘शाही सुरंग’ के नाम से जाना जाता था।
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रोबोटिक कैमरों के जरिये काशी के इस प्राचीन नाले के स्वरूप की जानकारी की जाएगी। इसके लिए जापान इंटरनेशनल को-आपरेशन एजेंसी (जायका) ने 92 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं।

गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई की निगरानी में चयनित निजी एजेंसी यह कार्य कराएगी। इसके लिए प्रारंभिक सर्वे शुरू हो गया है। तय कार्ययोजना के मुताबिक सितंबर बाद रोबोटिक सर्वे का काम शुरू हो जाएगा।
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प्राचीन ‘शाही नाला’ मौजूदा समय में भी शहर के सीवर सिस्टम का एक बड़ा आधार है लेकिन इसका नक्शा नगर निगम या जलकल के पास नहीं है। शहर की घनी आबादी से होकर गुजरा यह नाला पूरी तरह भूमिगत है।

यह प्राचीन काशी की जलनिकासी व्यवस्था की एक नजीर भी है। शहर के पुरनिये बताते हैं कि अंदर ही अंदर शहर के कई अन्य छोटे-बड़े नाले इससे जुड़े हैं लेकिन इसकी भौतिक स्थिति का पता न होने से नालों के जाम होने या क्षतिग्रस्त होने पर उसकी मरम्मत तक नहीं हो पाती।

शाही नाले का इतिहास

मुगलकाल के दौरान ‘शाही नाला’ को ‘शाही सुरंग’ के नाम से जाना जाता था। इसकी खासियत यह बताई जाती है कि इसके अंदर से दो हाथी एक साथ गुजर सकते हैं। शहर के पुरनियों का कहना है कि अंग्रेजों ने इसी ‘शाही सुरंग’ के सहारे बनारस की सीवर समस्या सुलझाने का काम शुरू किया।

जेम्स प्रिंसेप की कल्पना के अनुसार, इसका काम वर्ष 1827 में पूरा हुआ था। इसे लाखौरी ईंट और बरी मसाला से बनाया गया था। अस्सी से कोनिया तक इसकी लंबाई 24 किलोमीटर बताई जाती है।

यह अब भी अस्तित्व में है लेकिन उसकी भौतिक स्थिति के बारे में सटीक जानकारी किसी के पास नहीं है। पुरनियों के मुताबिक यह नाला अस्सी, भेलूपुर, कमच्छा, गुरुबाग, गिरिजाघर, बेनियाबाग, चौक, पक्का महाल, मछोदरी होते हुए कोनिया तक गया है।
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रोबोटिक कैमरों से खुलेगा रहस्य

गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के महाप्रबंधक जेबी राय ने बुधवार को बताया कि यह हकीकत है कि इसका नक्शा नगर निगम या जलकल के पास नहीं है। इस प्राचीन नाले की मुख्य लाइन अस्सी से कोनिया तक 7.2 किलोमीटर लंबी है, जो भेलूपुर चौराहा, बेनियाबाग मैदान, मछोदरी होते हुए गुजरी है।

इसकी सहायक लाइनें शहर के अन्य हिस्सों में फैली हैं। उदाहरण के तौर पर, अर्दली बाजार से आकर एक शाखा इसमें मिलती है। सितंबर बाद रोबोटिक कैमरों की मदद से इस नाले की भौतिक स्थिति का बारीकी से अध्ययन होगा।

कहां, किस प्रकार से यह नाला गुजरा है, उसकी मरम्मत की जरूरत है और क्या बाधा है, यह अच्छे से परखा जाएगा। सर्वे के बाद इसके जीर्णोद्धार का काम शुरू होगा। इसके लिए कार्यदायी संस्था का चयन करके अनुबंध कर लिया गया है।

नक्शा बनाना कठिन नहीं
मंडलायुक्त सभागार में बुधवार को मेट्रो रेल परियोजना के संबंध में हुई बैठक के दौरान ‘शाही नाला’ के नक्शे के बारे में भी चर्चा हुई। जीएम जेबी राय ने बताया कि सर्वे के आधार पर इसका नक्शा तैयार किया जाएगा। सर्वे के बाद ही इसकी वास्तविक गहराई, लंबाई, चौड़ाई और अन्य संबंधित जानकारियों का पता चल पाएगा।
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