झांसी में सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल कायम करते हुए पिता द्वारा शुरू की गई परंपरा को बेटा पूरा करने में लगा है। नगर के प्रमुख स्थानों पर सजने वाली मां दुर्गा की मूर्तियां को पहले मूर्तिकार अब्दुल खालिक तैयार करते थे, अब उस परंपरा को आगे ले जाने का दायित्व उनके पुत्र अब्दुल खलील निभा रहे हैं।
शहर के पुलिया नंबर नौ निवासी अब्दुल खालिक ने फूटा चौपड़ा कालीबाड़ी में बंधव समिति की ओर से आयोजित होने वाली दुर्गा पूजा के लिए मां दुर्गा की प्रतिमा बनाना शुरू किया था। वृंदावन से आए द्विजेंद्रनाथ गांगुली से उन्होंने मूर्ति बनाने की कला सीखी थी।
हालांकि, मूर्ति बनाने पर तब उन्हें अपने ही समाज के लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा था, लेकिन उन्होंने कभी किसी की परवाह नहीं की। इस परम्परा को कायम रखा और लगातार 45 साल तक यहां स्थापित होने वाली मूर्ति उन्होंने बनाई। एक अगस्त 2012 को अब्दुल खालिक ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। अब इस परंपरा को उनके पुत्र अब्दुल खलील आगे ले जाने में जुटे हैं।
बकौल अब्दुल खलील, मूर्तियों का निर्माण करने से उन्हें खुशी मिलती है। साल में वह तीन बार मूर्तियां बनाते हैं। नव दुर्गा पर दुर्गा की प्रतिमा, दीपावली पर मां काली और वसंत में मां सरस्वती की प्रतिमा तैयार करते हैं।
श्रीराम के ‘रसखान’ हैं रशीद
गीत और संगीत मजहबी दायरे से परे हैं। ब्रज में ऐसी कई मिसाल देखने को मिलती हैं। छंदों में कान्हा का गायन करने वाले रसखान हुए तो राम नाम गाने वाले रशीद कुरैशी मौजूद हैं। बैंड की धुन पर श्रीराम के भजनों के बोल सजाना, सौ से अधिक कलाकारों को गायन के लिए तैयार करना, खुद भी भजन लिखना रशीद के लिए रोजी रोटी का साधन ही नहीं साधना भी है।
जय-जय सियाराम, मैं तो रटूं आठों याम..., राम हमारे प्राणन प्यारे कर दो बेड़ा पार..., मेरे घट-घट में बसे हैं श्रीराम... और हनुमानजी के लिए ‘लाल लंगोटा, हाथ में सोटा, राम नाम को रटके। लांघ गए विकराल समुंदर पवन पुत्र बेखटके।’ रशीद कुरैशी की कलम से निकले भजन हैं। मेवाती मोहल्ला में रह रहे रशीद करीब ढाई दशक से प्रभु राम की लीला गा रहे हैं। उन्होंने बताया कि 1975 में बैंड में काम करने आए थे। 1982 में पहली बार श्रीरामलीला कमेटी ने गौरांग लीला में भजन गायन का अवसर दिया। इसी साल राम बारात में बैंड के साथ गायन का अवसर मिला। तब से आजतक यह क्रम जारी है।
पहले कुछ लोगों ने विरोध भी किया लेकिन लेकिन प्रभु की कृपा से अब सब ठीक है। रशीद बताते हैं राम बारात में गायन के लिए एक सैंकड़ा से अधिक कलाकारों को तैयार किया जाता है। इसके लिए तीन शिफ्टों में कड़ा रियाज होता है। रशीद शुरुआत में औरों के लिखे भजन और पैरोडी को बैंड की धुन पर सजाते थे। बीते कुछ सालों से बोल भी खुद ही तैयार कर रहे हैं। उनका कहना है कि अब मरते दम तक यही करते रहने की इच्छा है।
रामलीला में नहीं सुनाई देंगी इस्लाम की चौपाइयां
नोएडा सेक्टर-12 की रामलीला में अपनी बेजोड़ अवधी और कानों में रस घोल देने वाली चौपाइयों से मंत्रमुग्ध कर देने वाले कलाकार मो. इस्लाम इस बार नहीं दिखाई देंगे। अवध की गंगा-जमुनी तहजीब की पहचान बना बस्ती जिले का ये मुस्लिम कलाकार बीमारी के आगे लाचार हो गया है।
बजरंग रामलीला कमेटी के निर्देशक एक पांडेय ने बताया कि छह साल से वह यहां की रामलीला में कौशल्या का किरदार निभा रहे हैं। मो. इस्लाम पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन उनकी शख्सीयत इंसानियत का पाठ पढ़ाती है... मजहब के नाम पर बंटती दुनिया को एकता का संदेश देती है। उन्होंने बताया कि बस्ती जिले के बांसी स्थित मो. इस्लाम के घर से फोन पर जो खबर मिली वह दुखदायी थी। घरवालों ने बताया कि कई दिनों से वैद्य उनका इलाज कर रहे थे और कैंसर के लक्षण दिखाई देने पर उन्हें मुंबई जाने की सलाह दी गई है। मो. इस्लाम की माली हालत कमजोर है और इलाज के भी लाले पड़े हैं। उन्हें रामलीला में हिस्सा न ले पाने का अफसोस है। एके पांडेय का कहना है इस सूचना से सभी को आघात लगा है, क्योंकि छह साल से वह वह इस रामलीला का अभिन्न हिस्सा हैं। उन्होंने बताया कि कमेटी ने अपने कलाकार की मदद के लिए परिवार को हर संभव मदद का भरोसा दिया है।
रटी हुई है राम चरित मानस
घरवाले कहते हैं कि मो. इस्लाम 10 साल से रामलीला से जुड़े हुए हैं। रामलीला में चौपाइयां गाना, संगीत देना और महिला किरदारों को मंच पर निभाना मो. इस्लाम को बखूबी आता था। मो. इस्लाम नोएडा ही नहीं.. बस्ती, डुमरिया गंज, बैजावला, भुजडीह, खलीलाबाद समेत कई स्थानों पर रामलीला का हिस्सा बन चुके हैं। उन्हें रामचरित मानस के अलावा दुर्गा चालीसा और शिव चालीसा रटे हुए हैं। उनका खानदान काफी पहले से शास्त्रीय संगीत से जुड़ा हुआ है। उनके पिता छोटे लाल भी कत्थक नृत्य करते थे।