उच्च शिक्षा में मुस्लिम छात्रों की लगातार घटती भागीदारी का प्रमुख कारण ऐसे छात्रों के अभिभावकों की गरीबी है। ज्यादातर छात्रों के परिवार वाले उच्च शिक्षा के लिए फीस अदा करने की स्थिति में नहीं होते हैं।
इस लिए जरूरी है कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि फीस नहीं अदा कर पाने के कारण कोई बच्चा उच्च शिक्षा पाने से वंचित न हो।
अल्पसंख्यकों की शिक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय निगरानी समिति (एनएमसीएमई) ने एक रिपोर्ट में मानव संसाधन मंत्रालय से यह सिफारिश की है।
मानव संसाधन मंत्रालय को सौंपी गई इस रिपोर्ट के अनुसार इंटरमीडिएट के बाद देश में जहां सामान्य वर्ग के 100 में 18 बच्चे उच्च शिक्षा के लिए दाखिला ले रहे हैं, वहीं मुस्लिम वर्ग से सिर्फ 9.5 बच्चे ही कालेजों तक पहुंच पाते हैं।
इसका एक प्रमुख कारण मुस्लिम समाज की गरीबी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्र सरकार अनुसूचित जाति के बच्चों का सरकारी शिक्षा संस्थानों में पूरी तरह फीस माफ कर देती है तथा निजी कालेजों में भी उन्हें सीधे फीस नहीं देनी पड़ती।
उसी तरह मुस्लिम बच्चों को भी उच्च शिक्षा के लिए सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। प्रवेश के समय किसी बच्चे को केवल फीस जमा नहीं करा पाने के कारण पढ़ने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी कालेजों में दाखिला पाने वाले मुस्लिम छात्रों को प्रवेश के समय फीस न लेकर सरकार से फीस के रिफंड की व्यवस्था की जानी चाहिए।
केंद्र सरकार इसके लिए अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय को पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराए।
संबंधित कालेज राज्य सरकारों के माध्यम से मंत्रालय से ऐसे छात्रों की फीस का रिफंड हासिल करें जैसा कि अभी अनुसूचित जाति के छात्रों के मामले में किया जा रहा है।
मानव संसाधन मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार इस रिपोर्ट पर विचार किया जा रहा है।
संभव है कि अगले साल चुनाव को देखते हुए अल्पसंख्यकों के हित में रिपोर्ट में दी गई कुछ सिफारिशों को सरकार स्वीकार कर उन्हें जल्द ही लागू करने की घोषणा कर दे।