शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे की जिंदगी विडंबनाओं से भरपूर रही है। एक तरफ जहां वह मुसलिमों और पाकिस्तान के खिलाफ अपने भाषणों में आग उगलते थे तो व्यक्तिगत जीवन में वह इसके बिलकुल उलट थे।
पाक क्रिकेटरों की मुखालफत करने वाले हिंदू हृदय सम्राट ने एक ओर जावेद मियांदाद को अपने घर आमंत्रित किया तो बीमार पड़ने पर अपना इलाज भी एक मुसलिम डॉक्टर से ही कराते थे। जिंदगी के अंतिम क्षणों में भी बाला साहब ठाकरे के साथ एक मुसलिम ही मौजूद था।
लीलावती अस्पताल के प्रसिद्ध पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. जलील पारकर पिछले पांच साल से शिवसेना प्रमुख का इलाज कर रहे थे। ठाकरे परिवार के विश्वस्त पारकर ने ही मातोश्री के बाहर एकत्र शिवसैनिकों और मीडियाकर्मियों को बाला साहब की मौत की खबर दी थी। जानकारी देते वक्त पारकर की आंखों में आंसू साफ नजर आ रहे थे।
पारकर ने कुछ साल पहले सांस की समस्या से परेशान बाला साहब ठाकरे की फेफड़े संबंधी बीमारी का सफल इलाज किया था। उसी के बाद से पारकर ठाकरे परिवार के विश्वस्त बन गए थे। इसके बाद जब भी बाला साहब को स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत हुई पारकर को ही बुलाया गया। वह ठाकरे परिवार के इतने करीबी हो गए थे कि शिवसेना की सालाना होने वाली दशहरा रैली के दौरान अन्य वीआईपी के साथ ही वह भी मंच पर मौजूद रहते थे।
डॉ. पारकर ने पिछले पांच साल के दौरान पांच बार ठाकरे की जिंदगी बचाई। 2009 में जब बाला साहब को दूसरी बार दिल संबंधी बीमारी के इलाज की जरूरत पड़ी तो पारकर ने ही उनका इलाज किया। शिवसेना प्रमुख के बेटे उद्धव ठाकरे को जब कुछ महीने पहले हार्ट सर्जरी की आवश्यकता पड़ी तो डॉ. पारकर के नेतृत्व में ही मेडिकल टीम ने उनका इलाज किया।