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'शार्ली एब्डो का कवर छापने से अब मेरी जिंदगी को खतरा'

Mon, 02 Feb 2015 10:47 AM IST
अश्विन अघोर / बीबीसी संवाददाता, मुंबई
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उर्दू अखबार 'अवधनामा' के मुंबई संस्करण की संपादक शिरीन दलवी फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका शार्ली एब्डो के कवर को अपने अखबार में छापने के बाद मुसीबतों में घिर गई हैं। पेरिस स्थित शार्ली एब्डो के दफ्तर पर पिछले महीने हुए चरमपंथी हमले में संपादक समेत 12 लोग मारे गए थे। इसके बाद के अंक के कवर पर पैगंबर हजरत मोहम्मद को 'मैं शार्ली एब्डो हूँ' की तख्ती पकड़े हुए दिखाया गया था। कार्टून के ऊपर लिखा हुआ था, "सभी को क्षमा।"
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अखबार के 17 जनवरी के संस्करण में शार्ली एब्डो के इसी कवर को प्रकाशित करने के बाद शिरीन के खिलाफ कई जगहों पर पुलिस शिकायत दर्ज कराई गई। ठाणे जिले के मुंब्रा थाने की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। हालांकि उसी दिन वो जमानत पर रिहा भी हो गईं।

माफी के बाद भी मुकदमा

कार्टून छापने के दूसरे दिन ही शिरीन दलवी ने जनता से माफी माँगी थी, लेकिन फिर भी उनके ख‌िलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। उनकी गिरफ्तारी के लिए अनशन तक पर बैठने की धमकियां दी गईं और विरोध प्रदर्शन किए गए। शिरीन लोगों की धार्मिक भावना आहत करने के आरोप को खारिज करते हुए कहती हैं कि वे खुद मुसलमान हैं और पैगंबर की शान में गुस्ताखी की बात तो सोच भी नहीं सकतीं।

वे तो अभिव्यक्ति की पूरी आजादी के पक्ष में भी खड़ी होने का दावा नहीं करतीं। उनका कहना है कि उन्होंने कार्टून इसलिए नहीं छापा था कि वो अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करना चाहती थी।

उन्होंने कहा, "शार्ली एब्डो पर हमले के बाद जो संस्करण निकला वह रिकार्ड संख्या में बिका। हमने इस खबर को पोप के बयान से जोड़ कर छापा जिसमें उन्होंने कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि नहीं है, और धार्मिक मान्यताओं के साथ मजाक नहीं किया जाना चाहिए।" शिरीन के अनुसार वो किसी भारतीय उर्दू अखबार की पहली महिला संपादक हैं। उन्होंने अज्ञात स्थल से टेलीफोन पर बात कर उनपर गुजर रही त्रासदी बयाँ की।

संस्करण बंद नौकरी गई

जमानत मिलने के बाद भी शिरीन और उनके दो बच्चे आज तक अपने घर नहीं जा पाए हैं। तीनों उस दिन से अलग-अलग रह रहे हैं। शिरीन ने अपने एक दोस्त के घर पर पनाह ली है, तो उनके दो बच्चे रिश्तेदारों के घर पर रह रहे हैं। शिरीन चाहती हैं कि सारा मामला सहमति से निपट जाए। वो कहती हैं, "अगर मेरे निर्णय से किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस लगी हो तो उसके लिए मैंने माफी मांग ली है। मैं विनती करती हूँ कि अब इसे यहीं खत्म कर दिया जाए।"

इस विवाद के बाद अवधनामा अखबार ने अपना मुंबई संस्करण बंद कर दिया है, जिसके कारण शिरीन की नौकरी भी चली गई है। वो कहती हैं, "भले ही यह मामला यहाँ खत्म हो जाए, लोग मुझे माफ कर दें, लेकिन हमारी जिंदगी अब पहले जैसी नहीं हो सकती। मेरे बच्चों को बिना वजह तकलीफें सहनी पड़ रही हैं। पिछले 15 दिनों से न तो वह कॉलेज गए हैं और न ही मुझसे मिले हैं।"
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पत्रकारिता जीवन की पहली और आखिरी गलती

शिरीन मानती हैं कि बौद्धिक चीजों का जवाब बौद्धिक तरीके से देना चाहिए। वो कहती हैं, "खबर छापना मेरा अधिकार था। पसंद न आने पर उसपर आपत्ति जताना लोगों का अधिकार है। लेकिन इल्म का जवाब इल्म से देना चाहिए। अगर किसी खबर पर कोई आपत्ति हो तो, अगले संस्करण में उसका स्पष्टीकरण दिया जा सकता है।" शिरीन यह भी कहती हैं कि अगर उन्होंने गुनाह किया है तो अल्लाह उन्हें सजा देगा। देश में कानून का राज है और वो उसके तहत भी सजा पाने को तैयार हैं।

पर जो लोग उन्हें सज़ा देना चाहते हैं उन्हें ऐसा करने का कोई हक नहीं है। शिरीन के मुताबिक, "लोगों ने कहा है कि मुझे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ा जाएगा। मैं काफी डरी हुई हूं। जब मैं माफी मांग ही चुकी हैं, इस मुद्दे को यहीं खत्म कर दिया जाए।"

शिरीन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अब भी समर्थन करती हैं लेकिन इस कार्टून को छापने के अपने फैसले को वो अपनी पत्रकारिता जीवन की पहली और आखिरी गलती भी मानती हैं। 27 सालों से पत्रकारिता कर रही शिरीन फ‌िलहाल, कानूनी कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार हैं।
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