नेताजी ने भले अखिलेश को बचपन में न डांटा हो, भले ही छात्र जीवन में पढ़ाई-लिखाई के बहाने न डांटा हो पर इन दिनों खूब झिड़क रहे हैं। होंगे वह दूसरों के लिए देश के बड़े सूबे के मुख्यमंत्री। मुलायम सिंह के लिए तो वह बेटे हैं। साथ ही पार्टी चलाने वाले असली नेता भी। इसलिए जहां भी पिता बेटा एक मंच पर होते हैं, अखिलेश को एक दो बार झिड़की तो मिल ही जाती है। हालांकि उनकी फटकार नसीहत के रूप में ही होती है।
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कभी इस तरह कि चापलूसों को पास मत फटकने दो, कभी इस तरह कि काम ठीक नहीं हो रहा। मगर अखिलेश का भी जवाब नहीं। सरेआम पापा की डांट से उनका अपना इगो हर्ट नहीं होता। उन्हें यह नहीं लगता कि शादी-विवाह हो गया। दो बार सांसद का चुनाव जीत लिया। मुख्यमंत्री भी बन गए पर पापा इस तरह सरेआम डांटते हैं। मुलायम सिंह ने डांटना शुरू नहीं किया कि वह चुपचाप सिर झुका लेते हैं। सपा की सभी मंच पर भाषण करते हुए नेताजी को यह बात नागवार गुजरना स्वाभाविक था कि वह कीमती बातें कर रहे हैं और अखिलेश उन पर गौर करने के बजाय मोबाइल के बटन दबा रहे हैं।
एक-दो बार नेताजी ने देखा, पर फिर कह दिया कि हम इतनी महत्वपूर्ण बात कर रहे हैं, तुम मोबाइल पर लगे हो। डाक्टरों की ह़ड़ताल पर भी अखिलेश को नेताजी की झिड़की खानी पड़ी कि आप चापलूसी में मत फंसिए। अखिलेश की समस्या है कि सपा का आयोजन होगा तो नेताजी तो वहां रहेंगे ही। किसी न किसी बहाने खुले तौर पर फिर उन्हें टोका जाएगा।
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आखिर मोदी हैं ना...
भारतीय जनता पार्टी मगन है। आखिर उनके पास मोदी हैं ना। मोदी हैं इसलिए दिल्ली में मुख्यमंत्री पद के बड़े दावेदार नेता फिलहाल एक रेस्त्रां का उद्घाटन करने के लिए एक पूर्वी देश में गए हैं। भाजपा चाहे दिल्ली हो या उत्तराखंड, हर जगह एक ही शैली में चलती है। हर जगह यही ख्याल है कि सब क्यों माथापच्ची करें, आखिर मोदी हैं न। मोदी जब सब जगह जीत दिलाएंगे तो दिल्ली और देहरादून क्यों छूट जाएंगे। भाजपा इसी विश्वास में चलती है। इसलिए शीला दीक्षित की सरकार के समय कभी विरोधी दल के तेवर में नहीं दिखी।
और उत्तराखंड में महाआपदा के समय भी जब राज्य सरकार की चारों ओर अक्षमता और हालात से न निपट पाने पर किरकिरी हो रही थी, भाजपाई कांग्रेसी पतन पर खुश थे। लेकिन कहीं भी एक विपक्षी पार्टी के नाते सरकार का विरोध नहीं हो रहा था। यह भाजपाइयों की अपनी शैली है। एक ही आदमी हर स्तर पर लड़ता है। जब टिहरी लोकसभा के उपचुनाव थे तो एक तरफ साकेत के लिए पूरी कांग्रेस, मुख्यमंत्री और केंद्र के मंत्री सब प्रचार अभियान में थे। एक उपचुनाव के लिए मुख्यमंत्री के हेलीकाप्टर दिन में कई उड़ान भरे रहे थे, लेकिन वहीं भाजपा की प्रत्याशी लगभग अकेले ही घर-घर में प्रचार कर रही थी। कुछ खास बड़े नेताओं ने इस चुनाव से दूरी बनाई हुई थी।
इसी तरह दिल्ली में भाजपा में अन्ना अरविंद के आंदोलन के बाद थोड़ी चेतना आई। वरना भाजपा का कहीं पता न था। अब जब दिल्ली में फिर लोकसभा और देर सबेर विधानसभा चुनाव होने हैं, भाजपा नेता अपनी-अपनी अट्टालिकाओं में चले गए हैं। एक नेता तो हांगकांग की ओर निकल पड़े हैं। ऐसे समय जब एक-एक पल कीमती हो, इन नेता के बारे में सूचना है कि वह करीब आठ दस दिन हांगकांग के नजारों को निहारते रहेंगे। वे निश्चिंत होंगे क्योंकि उन्हें मालूम हैं कि वह फिलहाल लोकसभा का चुनाव नहीं ल़ड़ रहे हैं। रही भाजपा को जिताने की बात, तो मोदी हैं ना।
विधायक के चुनाव लड़ने पर पलटी
आम आदमी पार्टी की दिक्कत यह है कि अपनी ही बयानवाजी उसके लिए समस्या बन जाती है। आप ने पहले बिन्नी के मसले को इसी बात पर हल्का करने की कोशिश की थी कि किसी विधायक को लोकसभा का टिकट नहीं दिया जाएगा। लिहाजा बिन्नी को पार्टी लोकसभा का चुनाव नहीं लडाएगी। जबकि इससे पहले कानोकान खबर यह भी थी कि बिन्नी जब पहली बार रूठे तो उन्हें इसी बात पर मनाने की कोशिश थी कि दिल्ली में मंत्री नहीं बने पर लोकसभा में भेजे जाएंगे। बिन्नी का मामला सुलझा नहीं।
तभी पार्टी की तरफ से यह बात बड़े सलीके से फैलाई गई कि राखी बिड़ला को दिल्ली की सुरक्षित सीट पर चुनाव लड़ाया जा सकता है। यानि पार्टी की विधायक को टिकट न देने वाली धारणा के विपरीत राखी को उम्मीदवार बनाए जाने की बात उठी। पार्टी ने इस पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया कि बिन्नी और राखी के मामले में अलग-अलग मापदंड क्यों अपनाए जा रहे हैं। आखिर राखी बिड़ला की बात भी हवा हो गई कि उन्हें उम्मीदवार बनाया जा रहा है? इसके पीछे कई कारण हैं। लेकिन अब ताजा हवा बनारस से बहती हुई आई है।
आप वालों ने ही कहना शुरू कर दिया है कि अगर नरेंद्र मोदी बनारस से लड़ते हैं, तो केजरीवाल वहां आप के उम्मीदवार हो सकते हैं। यह एक तरह से राजनीति सनसनी फैलाने की कला है। जिससे व्यक्ति हमेशा खबरों में रहता है। लेकिन असल बात यही है कि फिर केजरीवाल भी आखिर विधायक हैं और पार्टी क्या उन्हें लेकर अपने मापदंड बदलेगी? पर आम आदमी पार्टी की यह अपनी शैली है। अपनी बातों पर मुकर जाए तो उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी इसका वह कहां परवाह करती है। आम आदमी पार्टी जो सोचेगी, वह करेगी। वैसे भी कुछ बातों को हमेशा हवा में ही उछालते रहना चाहिए।
अम्मा जयललिता! उत्तर की ओर देखो
नेता ज्योतिष की सलाह कदम-कदम पर लेते हैं। खासकर जब चुनाव का समय हो तब तो हर बात पर सलाह ली जाती है। यहां तक कि अपने को प्रगतिशील कहने वाली पार्टी के नेता भी चुपके-चुपके कुछ ऐसी पूजा-विधान कर देते हैं जिससे चुनाव में फायदा हो। कहा जा रहा है कि आईएडीएमके प्रमुख जयललिता को उनके ज्योतिषी ने सलाह दी है कि अभी केवल उत्तर की ओर देखे।
जाहिर है कि ज्योतिषी की सलाह उत्तर दिशा को लेकर ही होगी। राजनीतिक जानकार कह रहे हैं कि जयललिता पहली बार उत्तर दिशा के लिए कुछ खास रुझान दिखा रही हैं। ज्योतिषी की जो भी सलाह हो पर जयललिता को लग रहा है कि दक्षिण का सुख तो उन्हें मिलता ही रहा है, पर क्या पता नक्षत्र उत्तर दिशा में उनके लिए कुछ खास स्थितियां बना दें। स्वाभाविक है कि इतने साल की राजनीति के बाद उनकी भी तो महत्वाकांक्षा जाग सकती है। उन्हें भी तो लगता होगा कि उत्तर दिशा उनके लिए केवल कुछ सांसदों को भेजने और मंत्री बनाने तक सीमित क्यों रहे।
ऐसे में माहिर ज्योतिषियों ने उत्तर दिशा की ओर देखने के लिए कह दिया। उनकी पार्टी के लोग कह रहे हैं कि अम्मा अब उत्तर की ओर देखो। अम्मा ज्योतिषियों को कैसे समझाएं कि उत्तर की ओर तो वह बहुत दिनों से देख रही हैं। पर उत्तर में जाने के कुछ संयोग तो बनें। खैर, इतना जरूर है कि अम्मा ज्योतिषियों और कार्यकर्तांओं की इच्छा का सम्मान रख रही हैं। कहा जा रहा है कि इस बार उनके मंच भी उत्तर दिशा की ओर बन रहे हैं। रथ की बनावट भी ऐसी कि वह उत्तर की ओर देखें।
मतदाताओं का रुख जानने के लिए राजीव गांधी अपनी सभाओं में लोगों का रुख जानने की कोशिश करते थे। अपने भाषण के अंत में वो कहते थे, जरा हाथ उठाकर बताइए, कितने लोग कांग्रेस के उम्मीदवार को वोट देना चाहते थे। सभा में उठते हाथ और लोगों की प्रतिक्रिया उन्हें वहां के माहौल का आभास करा देती थी।
फिर तो सारे नेता इसी तरह लोगों से अपना हाथ उठाने की बात करने लगे। इसकी चरम परिणिति आम आदमी पार्टी है। आप के नेता चाहे केजरीवाल हों या कोई और, इतनी बार लोगों से हाथ उठाने के लिए आह्वान करते हैं कि श्रोता बार-बार हाथ उठाकर थक जाए। इसी तरह लोगों से पूछा भी जाता है। उनसे हां या ना में कोई अपेक्षा की जाती है।
उप्र के बनारस में केजरीवाल ने लोगों से यही पूछ लिया, बोलिए मोदी को यहां से लड़ना चाहिए या नहीं। उन्हें उम्मीद थी कि जनता जनार्दन जोर से कहेगी नहीं लड़ना चाहिए। मगर जनता का क्या करे। भीड़ से आवाज आई लड़ना चाहिए। तेज चतुर चाल वाले अरविंद केजरीवाल मुस्कराने के अलावा कुछ न कह सके।