‘नेताजी’! अपनों के बीच उनका यही नाम है। मीडिया उन्हें सपा सुप्रीमो कहता है। 73 साल पूरे कर चुके मुलायम सिंह यादव ने राम मनोहर लोहिया की विरासत और चौधरी चरण सिंह की राजनीति के अनुकरण के साथ ही अपनी अलग सियासी राह बनाई।
कुश्ती के अखाड़े से निकले इस सियासी पहलवान ने भले-बुरे वक्त में हमेशा अपनों का साथ दिया और विरोधियों को चित करने के लिए हर बार नए दांव का इस्तेमाल किया। नेताजी की सियासी कदम और उनके फैसले कभी किसी सांचे या खांचे में बंधे नहीं रहे। हर मौके के लिए उनके पास नया दांव रहा। मुलायम की इसी सियासी बाजगरी ने कई राजनीतिक धुरंधरों का भी चकमा दिया।
राजनीति के महारथी
सियासी समीकरण साधने में मुलायम का जोड़ नहीं। उनके विरोधी भी मानते हैं कि नेताजी के सियासी दांव अचूक होते हैं। हालांकि नेताजी का दांव निशाने से चूका भी है। एक बार वे प्रधानमंत्री की गद्दी पाते-पाते रह गए। 1996 में कांग्रेस की हार के बाद वामपंथियों के सहयोग से बनी तीसरे मोर्चे की सरकार में एचडी देवगौड़ा देश के प्रधानमंत्री बने तब मुलायम रेस में सबसे आगे थे। लेकिन वक्त ने साथ नहीं दिया न ही मुलायम के सियासी समीकरण ने। इस सरकार में मुलायम ने रक्षा मंत्री के तौर पर काम किया।
कुछ महीने पहले एफडीआई पर केंद्र की यूपीए सरकार को घेरने में मुलायम सिंह सिंह यादव ने उसी सियासी समीकरण की झलक दिखाई। तीसरे मोर्चे का हिस्सा रहे दल जिस उत्साह के साथ इस मसले पर मुलायम के साथ जुड़े उसने सपा कार्यकर्ताओं और नेताजी में जोश भर दिया। अगले लोकसभा चुनाव के बाद मुलायम के राजनीतिक कौशल की एक नई तस्वीर देश के सामने हो सकती है।
सामाजिक अंकगणित के मास्टर
पहलवानी के बाद शिक्षक के रूप में काम कर चुके मुलायम प्रदेश की सामाजिक संरचना को बखूबी समझते हैं। सामाजिक ताने-बाने का सियासी प्रयोग वे पहले भी कर चुके है और एक बार इस दिशा में उनका प्रयोग सामने आता दिख रहा है। अयोध्या आंदोलन के समय दक्षिणपंथी ताकतों के खिलाफ अपने मजबूत विरोध की वजह से मुलायम की एक अलग छवि बनीं। मंदिर मसजिद की सियासत का विरोध कर मुलायम ने मुसलमानों का दिल जीता।
पिछड़ों और खासकर यादवों की गोलबंदी कर उन्होंने पहली बार यूपी की सियासत में सामाजिक समीकरण का कामयाब प्रयोग किया। यूपी की सियासत में जातीय गणित के आधार पर रण जीतने का यह पहला कामयाब फार्मूला था, जिसे बाद में दूसरे दलों ने भी आजमाया।
‘मौलाना मुलायम’ का खिताब पाने वाले सपा सुप्रीमो अपनी इस छवि को लेकर बेहद संजीदा हैं और इसका भरपूर सियासी इस्तेमाल भी जानते हैं। लोकसभा चुनाव के लिए सपा की ओर से जारी सूची से साफ है कि मुलायम एक नए जातीय समीकरण पर काम कर रहे हैं और उनका एक नया सियासी फार्मूला बहुत जल्द लोगों के सामने होगा।
विवादों से भी रहा नाता
मुलायम की सियासत का विवादों से भी खासा नाता रहा। राजा भैया को साथ देने का मसला हो या दस्यु सुंदरी फूलन को सियासत में लाने का। हालांकि मुलायम आलोचना के बाद भी अपने इरादे से पीछे नहीं हटते। उनका तर्क है कि वह मुश्किल घड़ी में साथ देने वालों का साथ नहीं छोड़ सकते।
डाकू मान सिंह और दस्यु सुंदरी फूलन को सियासत में आगे बढ़ाने को लेकर उनके अपने तर्क रहे। उन्होंने सभी आलोचनाओं को दरकिनार कर उनका साथ दिया और समाज और सियासत की मुख्यधारा से जोड़कर उनकी जिंदगी को पटरी पर लाने का काम किया। आज भी दागी चरित्र के कई लोग उनकी पार्टी में सक्रिय हैं, लेकिन मुलायम की सियासत उनसे दूरी रखकर नहीं उन्हें खुद से जोड़कर आगे बढ़ती है। यह मुलायम की सियासत का खूंटाठोक नमूना है।
मुलायम सिंह यादव का सफरनामा
जन्म-22 नवंबर 1939
माता-पिता - मूर्ति देवी और सुघर सिंह
शिक्षा- बीए, बीटी और एमए
1967 में पहली बार विधायक चुने गए
1977 में पहली बार राज्यमंत्री बने
1980 में लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए
1982 में नेता प्रतिपक्ष चुने गए
1989 में पहली बार यूपी के मुख्यमंत्री बने
1992 में समाजवादी पार्टी की स्थापना की
1993 में दूसरी बार यूपी के सीएम का पद संभाला
(बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और जनता दल और कांग्रेस के सहयोग के सरकार बनाई)
1996 में मैनपुरी से जीतकर लोकसभा पहुंचे और संयुक्त मोर्चा सरकार में रक्षा मंत्री बने
2003 में बसपा-भाजपा सरकार के पतन के बाद बसपा के बागियों और निर्दलीयों की मदद से तीसरी बार मुख्यमंत्री बने
2012 चुनाव के बाद यूपी में इनके नेतृत्व में सपा ने बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की