मदर्स डे पर आज फिर बेटे-बेटियां मां को याद करेंगे, उन्हें गिफ्ट देंगे, उनकी पूजा करेंगे, उनका आशीर्वाद लेंगे। लेकिन कुछ ऐसी मांएं भी हैं, जो इस नाम और दिन का मतलब ही भूल गईं हैं, उन्हें अपनों से इतनी टीस मिली कि वह याद भी नहीं करना चाहतीं।
वृंदावन के आश्रय सदन में ऐसी भी माएं हैं, जिन्होंने अपना पेट काटकर बच्चों को पाल पोसकर बढ़ा किया, कामयाब बनाया लेकिन वही बच्चे कामयाबी की मंजिल पर पहुंचे तो मां को भूल गए। अब मांएं आश्रय सदनों में रह रही हैं तो उनके जिगर के टुकड़े महलों में।
बांके बिहारी के चरणों में मोक्ष की कामना करते हुए जिंदगी के बचे हुए दिन गुजार रही अमर देवी हों या माया पाल, परिवार और औलाद का जिक्र आते ही आंसू बहने लगते हैं।
मूल रूप से पंजाब के गांव किला रायपुर की रहने वाली अमरदेवी अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं। दस साल से यहां रह रही हैं।
कहतीं हैं, 'मेर पति बलराज सिंह सागर हॉकी के खिलाड़ी हुआ करते थे। कई पदक जीते, आसपास के इलाके में उनका बड़ा नाम था। अपने इकलौते लड़के कमलजीत सिंह सागर को पति की मौत के बाद मेहनत कर अच्छे स्कूल में पढ़ाया और इंजीनियर बनाया। आज वह अमेरिका की किसी कंपनी में इंजीनियर है। एक पोता भी है, जो गाजियाबाद की कंपनी में एकाउंटेंट है पर बूढ़ी मां को रखने की जगह किसी के पास नहीं। दस साल पहले घर से निकाल दिया और मैं वृंदावन भजन करने चलीं आईं। कई वर्ष हो गए बेटे ने बात तक नहीं की।'
पश्चिम बंगाल के गांव डयनाकोनी की रहने वाली माया पाल के पति 1964 के युद्ध के बाद लापता हो गए। इसके बाद उन्होंने अपनी दोनों बेटियों का पालन पोषण कर शादी की। आज बेटिया अपने घर की हो गईं, और माया पाल बेघर। बेटियों से कभी फोन पर बात हो जाती है। कहतीं हैं 'बाबू जमाई घर पर रखने को तैयार नहीं हुआ, इसलिए वृंदावन चली आई।'
चौबीस परगना निवासी माधुरी अधिकारी के पति दयालहरि अधिकारी की 25 साल पहले मौत हो गई। बेटे मिथुन को अच्छी परवरिश दी, लेकिन वह गलत सौबत में पड़ गया। एक दिन अपनी मां को ही घर से निकाल दिया। दस वर्ष पूर्व वह बंगाल से वृंदावन मोक्ष की कामना के लिए चलीं आईं।
सिलीगुड़ी की रहने वालीं 82 साल की रघुदासी को वृंदावन में रहते हुए 19 साल हो गए हैं। एक बेटा और एक बेटी है। भरा पूरा परिवार, लेकिन मां को रखने की जगह नहीं। बेटा कारपेंटर है और बेटी की शादी हो गई। बहू ने लड़कर घर से निकाल दिया। बेटे ने भी बहू का साथ दिया। दुनिया से मन उचट गया, तभी एक सहारा मिला सबिता दासी का। वे सबिता दासी के साथ वृंदावन आ गईं। तभी से यहां भजन कर रहीं हैं।
इस आश्रम में रह रही हर मां के दिल में एक टीस जरूर है लेकिन वे फिर भी वे अपने जिगर के टुकड़ों को बददुआ नहीं देती। महिला आश्रय सदन की संचालिका कंचन झा कहती हैं 'सत्तर प्रतिशत महिलाएं भरे पूरे परिवार की हैं। अधिकांश महिलाओं के बेटे अच्छी नौकरियों पर हैं, लेकिन मां को रखने के लिए किसी के पास जगह नहीं। अब इन महिलाओं का यही संसार है और ठाकुरजी उनका परिवार।'
सभी फोटो- अंशु गौड़