देश के युवाओं के कल्याण के लिए सरकारें चाहें जितने कानून व नीतियां बनाने के दावे कर लें लेकिन सच यह है कि युवाओं को इन कानूनों का फायदा मिलना तो दूर उन्हें ऐसे कानूनों की जानकारी तक नहीं है। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि भारत के नब्बे फीसदी से ज्यदा शिक्षित युवक न तो देश की नेशनल यूथ पॉलिसी के बारे में जानते हैं न ही उन्हें सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के बारे में पता है।
यह दावा किसी विपक्षी दल या एजेंसी का नहीं बल्कि केंद्र सरकार के अधीन नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा देश के युवाओं पर जारी एक रिपोर्ट में किया गया है। नेशनल यूथ रीडरशिप सर्वे फॉलोअप रिपोर्ट के अनुसार देश के केवल 9.3 फीसदी पढ़े लिखे युवाओं को नेशनल यूथ पॉलिसी की जानकारी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह औसत और भी कम 7.3 फीसदी है। बिहार व उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े राज्यों में केवल पांच फीसदी शिक्षित युवाओं को इसकी जानकारी है। यही स्थिति आरटीआई की भी है। देश में केवल 8.4 फीसदी शिक्षित युवकों को इसके बारे में पता है। हां मनरेगा जैसी मजदूरों के लिए चलाई जाने वाली योजना के बारे में 40 प्रतिशत से ज्यादा युवाओं को जानकारी है।
देश के युवा भले ही अपने कल्याण के बने कानूनों से अनभिज्ञ हैं लेकिन आरक्षण को लेकर देश के युवा काफी जागरूक हैं। सर्वे के अनुसार उच्च शिक्षा में जाति के आधार पर आरक्षण का ज्यादातर युवकों ने समर्थन किया है। असम में 50, बिहार में 43 तथा महाराष्ट्र के 46 फीसदी युवक उच्च शिक्षा में जाति आधारित आरक्षण का समर्थन करते हैं। संसद व विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण के मुद्दे पर देश के 66.7 फीसदी युवा समर्थन करते हैं जबकि 16.3 ने इसका विरोध किया है। पूर्वोत्तर राज्यों में तो यह समर्थन सर्वाधिक 74 फीसदी से भी अधिक है।