अहमदाबाद की एक अदालत ने कहा है कि नरेंद्र मोदी ने 2012 के विधानसभा चुनाव का पर्चा दाखिल करते समय अपनी वैवाहिक स्थिति का खुलासा न करके भले ही जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत अपराध किया हो लेकिन उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती।
मोदी ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125 (ए) (3) के तहत भले ही अपराध कि या हो लेकिन उनके खिलाफ एफआईआर तभी दर्ज हो सकती थी, जब शिकायत एक साल के भीतर की जाती।
कोर्ट ने दिया आदेश
आम आदमी पार्टी के नेता निशांत वर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए अहमदाबाद (ग्रामीण) कोर्ट ने कहा मोदी ने जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 125 (ए)(3) के तहत अपनी वैवाहिक स्थिति छिपा कर अपराध किया है।
लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 468 (2)(बी) के तहत इस तरह के मामले में शिकायत एक साल के भीतर ही करनी होती है।
चूंकि शिकायत एक साल चार महीने बाद दर्ज की गई है इसलिए मोदी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती। जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125 (ए)(3) के तहत शपथ पत्र दाखिल करते समय जानकारी छिपाने पर छह महीने तक की कैद हो सकती है।
अप्रैल में डाली गई थी याचिका
भारतीय दंड संहिता की धारा 468 अगंभीर अपराधों की सजा तक सीमित है। इसमें तीन साल से ज्यादा कैद की सजा नहीं हो सकती। इस धारा के तहत अदालत इस श्रेणी के अपराध में शिकायत के लिए तय अवधि बीत जाने पर संज्ञान नहीं लेती है।
वर्मा ने मोदी की ओर से अपनी वैवाहिक स्थिति छिपाने के खिलाफ अप्रैल में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। दरअसल वर्मा इस मामले पर मोदी के खिलाफ रनिप थाने में शिकायत दर्ज कराने गए थे।
कॉलम खाली छोड़ देते थे मोदी
लेकिन पुलिस अधिकारियों उनकी यह मांग ठुकरा दी। वर्मा ने इस मामले में मणिनगर विधानसभा क्षेत्र के चुनाव अधिकारी पी.के. जडेजा के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की थी।
वर्मा का कहना था मोदी का शपथ पत्र स्वीकार करने के आरोप में जडेजा के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
गौरतलब कि नरेंद्र मोदी ने पिछले लोकसभा चुनाव में बड़ोदरा लोकसभा सीट से पर्चा दाखिल करते समय पहली बार अपनी वैवाहिक स्थिति और पत्नी जशोदाबेन के नाम का जिक्र किया था।
इससे पहले विधानसभा चुनाव लड़ने के दौरान मोदी वैवाहिक स्थिति का कॉलम खाली छोड़ देते थे।