चुनावी जंग के ऐलान से पहले दिल्ली के तख्त के लिए आश्वस्त दिख रही भाजपा अब टिकट वितरण के बाद बैकफुट पर आ गई है। टिकटों के घमासान से पैदा कड़वाहट से पार्टी अब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के पीछे खड़ी दिखने की बजाय बंटी दिख रही है।
पार्टी नेतृत्व भी मानने लगा है कि फरवरी तक कार्यकर्ताओं और नेताओं में मोदी को लेकर जो उत्साह दिख रहा था, प्रत्याशी तय करने के बाद वह नदारद सा है।
कार्यकर्ता चुनाव की तैयारी करने की बजाय पार्टी नेतृत्व के खिलाफ सड़कों पर हैं। पार्टी के पितामह लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, लालजी टंडन, कलराज मिश्र जैसे बुजुर्ग नेताओं के अलावा सुषमा स्वराज भी नाखुश हैं और जसवंत सिंह भी बगावत की राह पर हैं। इसके लिए मोदी और राजनाथ सिंह की जोड़ी पर उंगली उठ रही है।
'बुजुर्ग नेता' वाली दलील में दम नहीं
माना जा रहा है कि बुजुर्ग नेताओं की नाराजगी इस जोड़ी को भारी पड़ सकती है। दरअसल, मामला आडवाणी, जोशी अथवा जसवंत सिंह तक सीमित नहीं है। भाजपा में कहा जाता रहा है कि संघ भी चाहता है कि नई पीढ़ी के लिए बुजुर्ग नेताओं को रास्ता खाली कर लेना चाहिए। पार्टी के एक नेता का कहना था कि जब पहली पीढ़ी हटेगी तभी दूसरी पीढ़ी आगे आ पाएगी। वैसे भी मोदी या राजनाथ जैसे नेताओं की दूसरी पीढ़ी भी 60-65 की उम्र तक पहुंच गई है।
हालांकि, इस दलील में ज्यादा दम नहीं दिख रहा है। पार्टी ने 80 वसंत देख चुके दो पूर्व मुख्यमंत्रियों बीसी खंडूरी व शांता कुमार जैसे कई वरिष्ठ नेताओं को पहले ही मैदान में उतार दिया है। सूत्रों का कहना है कि टिकट देने में उन बुजुर्ग नेताओं को ही परेशान किया गया, जो चुनाव बाद मोदी और राजनाथ की जोड़ी को चुनौती दे सकते हैं। मसलन, आडवाणी, जोशी व जसवंत सिंह।
कल्याण सिंह व यशवंत सिन्हा के बेटों को टिकट देकर पहले ही चुनावी दौड़ से अलग कर दिया गया है। वैसे यह भी सच है कि हर बार कई बुजुर्ग नेता पार्टी नेतृत्व से यह कहकर टिकट मांगते रहे हैं कि यह उनका आखिरी चुनाव है। इस बार मोदी की लहर है, इसलिए जीत निकट देख सभी चुनाव लड़ना चाहते हैं।