तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयराम जयललिता जब किसी पर निशाना साधती हैं तो ये हमला ज़ोरदार होता है। अपने मुक़ाबले में खड़े किसी भी व्यक्ति को वो छोड़ती नहीं हैं, फिर चाहे वो उनके दोस्त और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों।
विज्ञापन
बीते दिनों राज्य की 39 लोकसभा सीटों में सघन चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने रुख़ को एक से अधिक बार बदला, ताकि जनता के बीच उनका संदेश साफ़ तौर से जा सके। उनके रुख़ में आए इस बदलाव ने उनके दोस्तों के साथ ही विरोधियों को भी चौंकाया है।
सिर्फ़ कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार पर निशाना साधने के बजाए अब वो गुजरात में नरेंद्र मोदी के विकास के दावों पर भी सवाल उठा रही हैं। इससे आगे बढ़कर वो मतदाताओं से कहती हैं कि अपने वोट को बांटकर उसे बर्बाद न कीजिए। पहली नज़र में इसका मतलब है कि मतदाताओं को भाजपा के गठबंधन साझेदारों को वोट नहीं देना चाहिए।
विज्ञापन
तमिलनाडु की ज़मीनी हक़ीक़त
साफ़ है कि उनका ये रुख़ ज़मीनी हक़ीक़त को बताता है। एक छोटी मुस्लिम पार्टी जो एआईएडीएमके को समर्थन दे रही थी, वो उनके प्रतिस्पर्धी डीएमके से जा मिली है। डर ये है कि 'निश्चित रूप से मैडम चुनावों के बाद मोदी को समर्थन देंगी।' चुनाव अभियान समाप्त होने के बाद इन पंक्तियों की गूंज पूरे राज्य में सुनाई देगी।
डेक्कन क्रॉनिकल के स्थानीय संपादक भगवान सिंह ने बीबीसी को बताया, "ये एकदम साफ़ है कि जिन मतदाताओं ने विधानसभा में उन्हें (जयललिता) वोट दिया था, उनका दूसरी तरफ जाना शुरू हो गया है। ऐसे में वो नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ आक्रामक हैं, क्योंकि डीएमके को फ़ायदा मिलता दिखाई दे रहा है। वास्तव में मोदी की लगातार यात्रा से भी एआईएडीएमके को नुक़सान पहुंचा है।"
जयललिता मोदी के इस दावे पर ज़ोरदार हमला कर रही हैं कि गुजरात का विकास मॉडल देश में सबसे बढ़िया है। उन्होंने आंकड़ों की मदद से ये साफ़ किया है कि गुजरात के मुक़ाबले तमिलनाडु कहीं अधिक विकसित है। न केवल मानव विकास सूचकांकों के आधार पर बल्कि औद्योगिकरण के लिहाज से भी। जयललिता कहती हैं, "तमिलनाडु की लेडी गुजरात के मोदी से बेहतर हैं।"
अपनी-अपनी दावेदारी
विकास की इस दावेदारी में शामिल होते हुए डीएमके प्रमुख करुणानिधि के बेटे एमके स्टालिन ने कहा, "लेडी ने नहीं, बल्कि मेरे डैडी ने तमिलनाडु का विकास किया।"
अगर इन चुनावी तुकबंदियों को छोड़ दें तो भी ये साफ़ है कि डीएमके ने अपने कैडर में इतना जोश तो भर ही दिया है कि जयललिता इस बार वैसी जीत न दर्ज कर सकें जैसी 2004 में डीएमके ने हासिल की थी।
मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवेलपमेंट स्टडीज़ (एमआईडीएस) के प्रोफ़ेसर एस। जनकराजन ने बताया, "ज़मीनी स्तर पर उसका मज़बूत संगठनात्मक ढांचा एआईएडीएमके की भारी जीत को मुश्किल बना रहा है।"
जनकराजन इसका श्रेय करुणानिधि के छोटे बेटे स्टालिन की संगठनात्मक क्षमता को देते हैं। वो कहते हैं, "ये पिता से बेटा को स्वाभाविक हस्तांतरण नहीं है। इस चुनाव में स्टालिन अपने पिता के उत्तराधिकार को तर्कसंगत ठहरा रहे हैं।"
राजनीतिक प्रेक्षक इस राय से सहमत नहीं हैं कि अगर स्टालिन और उनके बड़े भाई एमके अलागिरी के बीच प्रतिस्पर्धा न बढ़ी होती तो डीएमके जयललिता के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर सकती थी।
अब अलागिरी अपने समर्थकों से डीएमके को तीसरे स्थान पर पहुंचाने के लिए कह रहे हैं।
मदुरै स्थित मानवाधिकार कार्यकर्ता आर सत्यमूर्ति कहते हैं, "वो खुलकर लोगों से डीएमडीके और एमडीएमके को जिताने के लिए कह रहे हैं। ये दोनों दल भाजपा गठबंधन में शामिल हैं। वो डीएमके के वोट काट सकते हैं, लेकिन वो जिनका समर्थन कर रहे हैं, उनकी जीत सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं, जैसा कि उन्होंने 2006 के विधानसभा चुनावों में किया था।"
लब्बोलुआब ये है कि एआईएडीएमके को बढ़त हासिल है, जबकि डीएमके का सफ़ाया नहीं होगा, जैसा कि कुछ सप्ताह पहले चुनाव प्रचार की शुरुआत में अनुमान जताया जा रहा था।