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दादरी के बहाने पाक मीडिया का मोदी पर निशाना

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पाकिस्तान के उर्दू अखबारों में एक तरफ समझौता एक्सप्रेस को लौटाने के लिए भारत की आलोचना हो रही है, वहीं दिल्ली के करीब दादरी में गोमांस की अफवाह पर हुई हिंसा की भी खूब चर्चा है।
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अखबार ‘जंग’ लिखता है कि भारत में पाकिस्तान दुश्मनी के साथ-साथ मुस्लिम दुश्मनी भी चरम पर पहुंच गई है।दादरी के बिसाहडा गांव की घटना का जिक्र करते हुए अखबार लिखता है कि हिंदू कट्टरपंथियों ने एक मुसलमान को गोमांस खाने के संदेह में मार डाला, जबकि हकीकत में मांस गाय का नहीं, बल्कि बकरे का था।

अखबार कहता है कि भारत गोमांस निर्यात करने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बडा देश है, लेकिन देश के भीतर गोकशी को बहाना बनाकर मुसलमानों पर हमले हो रहे हैं।

विधानसभा में हंगामा

वहीं ‘वक्त’ लिखता है कि मोदी के राज में ही एक मुसलमान का जबरदस्ती रोजा तुडवाया गया, लोभ लालच और धमकी से मुसलमनों को ‘घर वापसी’ के नाम पर दोबारा हिंदू बनाने की मुहिम चलाई गई और अब गोमांस की अफवाह पर 50 साल के एक व्यक्ति को पीट-पीट कर मार डाला गया।

अखबार लिखता है कि जम्मू-कश्मीर में गोमांस की बिक्री पर पाबंदी का विरोध करने पर विधानसभा में बीजेपी के सदस्यों ने गुंडागर्दी करते हुए एक मुस्लिम सदस्य अब्दुल रशीद के साथ मारपीट भी की।

मोदी पर मुसलमान विरोधी नीतियां अपनाने का आरोप लगाते हुए अखबार कहता है कि वो कभी सत्ता में नहीं आते, अगर चुनावों में मुसलमान वोटों का बंटवारा नहीं होता।
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सरकार की लोकप्रियता हो रही है कम

वहीं ‘जसारत’ ने लिखा है कि भारत में ऐसे भी हिंदू हैं जो कहते हैं कि हमने गोमांस खाया है, आओ हमें कत्ल करो, लेकिन कोई भारतीय मुसलमान ऐसा कहने की जुर्रत नहीं कर सकता है। साथ ही अखबार लिखता है कि इसी महीने अमरीकी दौरे पर जा रहे प्रधानमंत्री नवाज शरीफ राष्ट्रपति ओबामा से होने वाली मुलाकात में कश्मीर के मुद्दे को उठाएंगे।

वहीं ‘एक्सप्रेस’ ने भारत की इस दलील पर सवाल उठाया है कि पटरियों पर बैठे किसानों के आंदोलन को देखते हुए ही समझौता एक्सप्रेस को वापस लौटाना पडा। अखबार कहता है कि भारतीय किसान तो अपने प्रदर्शनों का एलान पहले ही कर चुके थे और भारत सरकार को इस बात का पता था, फिर ऐन वक्त पर ही ‘समझौता एक्सप्रेस’ को रोकने का संदेश क्यों दिया।

भारत की मंशा पर सवाल उठाते हुए अखबार लिखता है कि अभी तो समझौता ट्रेन रोकी है, आगे-आगे देखिए भारत की सरकार और क्या गुल खिलाती है।वहीं रोजनामा ‘पाकिस्तान’ कहता है कि इस तरह गाडियों का रोका जाना और किसानों का आंदोलन करना दिखता है कि मोदी सरकार की लोकप्रयिता कम हो रही है।
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