भूमि अधिग्रहण बिल पर गठित संसद की संयुक्त समिति की शुक्रवार को हुई पहली बैठक में मोदी सरकार ने बिल को देश, खासकर ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए बेहद अहम बताया। बैठक में 8 और 9 जून को होने वाली समिति की दूसरी और तीसरी बैठक से पहले किसान संगठनों से राय लिए पर सहमति बनी।
हालांकि सरकार चाहती थी कि किसान संगठनों से पहले बिल पर औद्योगिक संगठनों की राय ली जाए। मगर इसका माकपा के मोहम्मद सलीम, कांग्रेस के जयराम रमेश और तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओब्रायन ने तीखा विरोध किया।
इनके समर्थन में जदयू के शरद यादव और एनसीपी के शरद पवार के आ जाने के बाद समिति ने किसान संगठनों की राय जानने के बाद औद्योगिक संगठनों से बातचीत का फैसला किया। समिति जल्द ही किसान संगठनों को बिल पर अपनी राय देने के लिए पत्र लिखेगी। विपक्ष 8 जून को होने वाली समिति की दूसरी बैठक में अपना पक्ष रखेगा।
'किसानों को अपनी जमीन का पहले से ज्यादा मुआवजा'
बैठक में सरकार ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की आधारभूत संरचना तैयार करने के लिए पुराने बिल में संशोधन जरूरी हो गया था। सरकार ने दावा किया कि संशोधित बिल के कानूनी जामा पहनने के बाद न केवल विकास के नए अवसर पैदा होंगे, बल्कि किसानों को अपनी जमीन का पहले से ज्यादा मुआवजा भी मिलेगा।
इस दौरान सरकार की ओर से समिति के अध्यक्ष एसएस अहलूवालिया ने पुराने बिल की खामियां भी गिनाई। उन्होंने कहा कि सरकार पुराने बिल की आलोचना नहीं कर रही। उस समय भाजपा ने बिल का समर्थन किया था। पुराने बिल के कानूनी जामा पहनने के बाद कई तरह की दिक्कतें सामने आईं। कई राज्यों ने बिल के कुछ प्रावधानों में परिवर्तन की मांग की थी।
बहुमत के अभाव में इस बिल को कानूनी जामा नहीं पहना पाई
अहलूवालिया ने कहा कि बिल में संशोधन और नया प्रावधान कर सरकार का इरादा भूमि अधिग्रहण की स्थिति में किसानों को ज्यादा से ज्यादा मुआवजा देने का है। उन्होंने कहा कि सरकार का इरादा ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं के लिए ढांचा खड़ा करना है। वहां अस्पताल और सिंचाई की सुविधा देनी है। इसके लिए पुराने कानून के कुछ प्रावधानों में बदलाव जरूरी था।
उन्होंने कहा कि सरकार का इरादा इस बिल के माध्यम से न तो उद्योगपतियों को जमीन उपलब्ध कराने का है और न ही जबरन जमीन अधिग्रहण करने का। मालूम हो कि दो-दो बार अध्यादेश जारी करने के बावजूद मोदी सरकार राज्यसभा में बहुमत के अभाव में इस बिल को कानूनी जामा नहीं पहना पाई। अंत में सरकार को विपक्ष के तीखे तेवरों के सामने झुकते हुए संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की मांग स्वीकार करनी पड़ी। समिति संसद के मानसून सत्र के पहले दिन अपनी रिपोर्ट पेश करेगी।