अलग राज्य का दर्जा पाने के बाद मिजोरम में ये छठां विधानसभा चुनाव हो रहा है। सत्ता की बागडोर कांग्रेस के हाथ में है और मुख्यमंत्री ललथनहवला को यकीन है कि विधानसभा चुनाव के बाद उनकी पार्टी दोबारा सरकार बनाएगी।
कांग्रेस ने 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में जबर्दस्त जीत दर्ज की थी। पार्टी को 40 में से 32 सीटें मिली थीं और मिजो नेशनल फ्रंट (एमएफएन) को 10 साल बाद सत्ता गंवानी पड़ी थी।
ललथनहवला ने पांचवी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। इससे पहले वे 1984, 1987, 1989 और 1993 में मुख्यमंत्री पद के लिए चुने गए थे।
मिजोरम में चुनावी राजनीति
आजादी के बाद मिजोरम आसाम राज्य का एक हिस्सा था। लेकिन मिजो यूनियन जैसे कई संगठनों की मांग मिजोरम एक अलग राज्य के रूप में गठित करने की थी। मिजो नेशनल फ्रंट ने स्वंतत्र और स्वायत्त मिजोरम प्रदेश के लिए सशष्त्र संघर्ष भी किया।
भारत सरकार ने मिजोरम को 1971 में केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया। 1986 में केंद्र सरकार और विद्रोही मिजो नेशनल फ्रंट के बीच हुए एक शांति समझौते के बाद 20 फरवरी 1987 को मिजोरम का भारत के 23वें राज्य के रूप में गठन किया गया।
उस समय मिजोरम में कांग्रेस की सरकार थी और ललथनहवला मुख्यमंत्री थे। लेकिन शांति समझौते की शर्तों के कारण उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
एमएनएफ ने नई सरकार का गठन किया और इसके लालडेंगा मुख्यमंत्री चुने गए। 1987 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस दोबारा सत्ता में लौट आई और ललथनहवला मुख्यमंत्री चुने गए।
ललथनहवला के नेतृत्व में कांग्रेस 1998 तक सत्ता में काबिज रही।
जोरामथांगा और एमएनएफ का दौर
1998 के विधानसभा चुनावों में जोरामथांग के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया। उस विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन 6 ही सीटों पर जीत पाई।
एमएनएफ ने 28 सीटों पर चुनाव लड़कर 21 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। 1998 के विधानसभा चुनाव में पहली बार भाजपा, जनता दल, समता पार्टी और लोक शक्ति जैसी पार्टियों ने भी अपना भाग्य आजामाया था। हालांकि इन्हें एक भी सीट नहीं मिली थी।
जोरामथांगा के नेतृत्व में ही मिजो नेशनल फ्रंट ने 2003 में दोबारा सत्ता में वापसी की थी। उन चुनावों में भी पार्टी को 21 सीटें ही मिली थी। हालांकि थांगा ये कामयाबी 2008 में नहीं हासिल कर पाए और कांग्रेस उन्हें सत्ता से बाहर करने में सफल रही।
इस विधान सभा चुनाव में भी कांग्रेस और एमएनएफ में ही टक्कर है। कांग्रेस को सत्ता में वापसी का यकीन है तो एमएनएफ सत्ता विरोधी वोटों से उम्मीद लगाकर बैठी है।