आम आदमी पार्टी के सबसे बड़े नेता अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल सितंबर महीने में अपने विधायकों को मशविरा दिया कि जो उन्हें खरीदने की कोशिश करे, वे उसकी बातें रिकॉर्ड कर लें। उचित वक्त आने पर उन सभी का खुलासा किया जाएगा।
केजरीवाल ने उन्हीं दिनों भाजपा की दिल्ली ईकाई के उपाध्यक्ष शेर सिंह डागर पर अपने दो विधायकों दिनेश मोहनियां, रघुवीर दहिया को खरीदने का आरोप लगाया था। प्रेस कांफ्रेंस कर उन्होंने दिनेश, रघुवीर, शेर सिंह और उन्हीं के एक सहयोगी विवेक यादव की बातचीत का वीडियो रिलीज किया था।
वीडियो के सामने आने के बाद भाजपा बैकफुट पर आ गई। दिल्ली में सरकार बनाने की कथित कोशिशें चल रही थीं। आप का दावा था कि भाजपा उसके विधायकों को तोड़कर सरकार बनाने की कोशिश में है। हालांकि स्टिंग सामने आने के बाद भाजपा ने शेर सिंह डागर को दरकिनार कर दिया और सरकार बनाने से तौबा कर ली।
जोड़तोड़ करते रंगे हाथों पकड़े गए मिस्टर ईमानदार
मशविरा पाने वाले विधायकों में राजेश गर्ग भी शामिल थे। राजेश गर्ग ने केजरीवाल की सलाह पर गंभीरता से अमल किया और उन्होंने उन्हीं की बातें रिकॉर्ड कर लीं। केजरीवाल उन्हें कांग्रेस के विधायकों को तोड़ने की सलाह दे रहे थे।
दरअसल लोकसभा चुनावों के बाद केजरीवाल ने दिल्ली में दोबारा सरकार बनाने की कोशिश की थी, जबकि पिछले साल फरवरी महीने में केजरीवाल ने जनलोकपाल के मुद्दे पर कांग्रेस पर सहयोग न करने का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया।
केजरीवाल ने आप आदमी पार्टी के गठन के बाद से ही गठबंधन या जोड़तोड़़ की राजनीति की आलोचना की थी। अपने पहले विधानसभा चुनाव में उन्होंने कई बार ये कहा था कि वे न समर्थन लेंगे और न किसी को देंगे।
2012 के विधानसभा चुनाव में जब आप की 28 सीटें आई, तब भी केजरीवाल ने कहा कि वे न किसी का समर्थन लेंगे और न किसी को समर्थन देंगे। हालांकि बाद में उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई। उस समय केजरीवाल ने कहा कि उन्होंने कांग्रेस से समर्थन मांगा नहीं, बल्कि उन्होंने दिया है।
वैसे राजेश गर्ग के ऑडियो क्लिप को सही मानें तो इस बार केजरीवाल ही जोड़तोड़ करते पकड़ लिए गए।
आंतरिक लोकतंत्र के गुब्बारे में खुद ही चुभो दी सुई
केजरीवाल स्वराज के प्रबल समर्थकों में रहे। उन्होंने अन्य पार्टी में आला कमान संस्कृति का भी विरोध किया। हालांकि आम आदमी पार्टी में स्वराज और आंतरिक लोकतंत्र का सवाल उठा तो केजरीवाल ही राह का रोड़ा बनकर खड़े हो गए।
योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को आप की राजनीतिक मामलों की समिति से बाहर करने के फैसला किया गया, तो ऐसी खबरें आईं कि फैसले के पीछे केजरीवाल थे। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने कई ऐसे मुद्दे उठाए थे, जो उन दोनों के मुताबिक आप के मूल सिद्घांतों के खिलाफ थे।
उन मुद्दों में दागी व्यक्तियों को टिकट देना, फर्जी चंदे, मुख्यमंत्री और संयोजक पद जैसे मुद्दे शामिल थे। आप के आंतरिक लोकपाल एडमिरल रामदास ने भी आप की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाई, लेकिन अरविंद केजरीवाल और आप के नेताओं ने उन सवालों का जवाब देने के बजाय, सवाल उठाने वाले नेताओं को ही दरकिनार कर दिया।
दागियों को भी थमा दिया अपनी पार्टी का टिकट
आम आदमी पार्टी ने स्वच्छ छवि के व्यक्तियों को टिकट देने की बात कही। उन्होंने 2012 के चुनावों में दिल्ली की सभी विधानसभाओं में वोटरों की राय लेकर प्रत्याशी तय किए, जबकि पिछले चुनावों में आप ने अपना तौर-तरीका बदल दिया।
आप ने इस बार मतदाताओं की राय लेने के बजाय, आंतरिक स्तर पर प्रत्याशियों का चयन किया। प्रत्याशियों के चयन में ये जरूर देखा गया कि उसमें जीतने की क्षमता है या नहीं। नई चयन प्रणाली के बाद आप के कई प्रत्याशियों पर आरोप लगे।
आरोपों के बाद आप ने अंतिम समय में दो प्रत्याशियों के टिकट रद्द कर दिए। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने अपनी चिट्ठी में आरोप भी लगाया कि आप के 12 उम्मीदवारों पर आरोप थे, जिनमें दो का टिकट रद्द हुआ और 6 को सशर्त नामांकन कराया गया। चार को निर्दोष पाया गया।
आप के ही उम्मीदवार नरेश बाल्यान की अवैध शराब पकड़ी गई। उनके खिलाफ अब भी मामला चल रहा है। आप ने अन्य दलों के दागी नेताओं की हमेशा आलोचना की, लेकिन इस बार खुद ही दागियों को टिकट थमा दिया।