बलात्कार पीड़िता की निजता भंग करने वाले चिकित्सकीय परीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है।
सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि बलात्कार की शिकार युवती का चिकित्सक द्वारा उंगली से परीक्षण किया जाना उसकी निजता पर सीधा हमला है।
पीड़िताओं को इस तरह के परीक्षणों से आज के आधुनिक और वैज्ञानिक दौर में जल्द छुटकारा दिलाया जाना चाहिए।
जस्टिस बीएस चौहान की अध्यक्षता वाली पीठ ने गैंगरेप के दोषी की याचिका खारिज करते हुए दो उंगलियों से किए जाने वाले परीक्षण के सही होने और विश्वसनीय होने पर सवाल उठाए हैं।
पीठ ने सवाल किया आखिर उंगली परीक्षण से यह कैसे साबित हो सकता है कि बलात्कार हुआ या नहीं। रिपोर्ट के पॉजिटिव होने पर आरोपी के बचाव में महिला के चरित्र पर सवाल उठाए जाते हैं।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि महिला भले ही चरित्रवान न हो, लेकिन इससे किसी को यह लाइसेंस नहीं मिल जाता कि वह उसे अपनी हवस का शिकार बनाए।
शीर्ष अदालत ने हरियाणा के जिंद जिले में छठी कक्षा की छात्रा से बलात्कार के मुजरिम राजेश की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि 13 साल नौ माह की छोटी उम्र में दरिंदों की हवस का शिकार बनी बालिका के चरित्र पर लांछन लगाकर अभियुक्त को बचाने की कोशिश को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
नाबालिग से बलात्कार के मामलों में सहमति का सवाल ही नहीं उठता। उसकी सहमति से बनाए गए संबंध कानून की नजर में बलात्कार है।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि पीड़िता के चिकित्सकीय परीक्षण का पैमाना तय करने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र यौन उत्पीड़न का शिकार महिलाओं की गरिमा और उनके मानवाधिकार को लेकर प्रस्ताव पारित कर चुका है।
परीक्षण के लिए पीड़िता की सहमति जरूरी है। उसकी निजता से समझौता नहीं किया जा सकता।