अलीगढ़ जिले में शहीद देवेंद्र के गांव मुहरैनी में शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का तांता लगा हुआ है। गांव में मेला जैसा लगा हुआ है, गांव के लोग भी देवेंद्र की शहादत से जहां दुखी हैं, वहीं उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया है।
मुहरैनी निवासी पोस्टमास्टर सोवरन सिंह का दूसरे नंबर बेटा देवेंद्र पाकिस्तानी सेना के साथ मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गया। यह जानकारी सोमवार को देर शाम हो गई थी। यह सूचना गांव के साथ ही आसपास के लोगों को भी हुई तो लोग सोवरन सिंह के आवास पर शोक संवेदना प्रकट करने पहुंचते रहे।
गांव के लोगों का कहना है कि देवेंद्र ने गांव का नाम रोशन कर दिया। गांव में हर आने-जाने वाला गमजदा तो है ही इसके साथ ही देवेंद्र की शहादत पर कहते हैं कि देवेंद्र ने शहीद होकर अपने नाम के साथ ही अपने मां-बाप परिवार के साथ ही गांव के नाम को अमर कर दिया है।
गांव में मीडिया कर्मी भी मंगलवार को सुबह ही पहुंच गए। वहीं शहीद की दोनों बहनें और उनके ससुरालीजन भी गांव पहुंच गए। घर पर भारी भीड़ बनी हुई है, हर व्यक्ति शहीद के परिजनों से मिलना चाहता है, शहीद के संबंध में जानकारी करना चाहता है।
राजनीति और अफसरशाही में पिस रही फौज
मुझे मेरे बेटे की शहादत पर गर्व है। सीमा पर डटा हर जवान मेरे बेटे के जैसा है। लेकिन सीमा पर कब तक गरीब और किसानों के लाल शहीद होते रहेंगे। कब तक फौजी जवान राजनीति और अफसरशाही के बीच पिसते रहेंगे।
यह कहना है शहीद देवेंद्र के पिता सोबरन सिंह का। आंखों में आने वाले आंसुओं को पीते हुए उन्होंने दर्द बयां करते हुए कहा कि आखिर कब तक सीमा पर गोलियां जवानों का सीना छलनी करती रहेंगी। क्यों नहीं समस्या का बैठकर बातचीत के साथ कोई हल निकाला जाता है।
उन्होंने सरकार के वादों पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि चुनावों से पहले तो नरेंद्र मोदी पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए हर वक्त तैयार दिखते थे। लेकिन आज जब हर रोज हमारे जवान शहीद हो रहे हैं तो सरकार खामोश क्यों है। कब हमारे शहीद जवानों की मौत का बदला लिया जाएगा।
दोस्त के पैगाम से पहले पहुंची मौत की खबर
शहीद देवेंद्र का दोस्त राकेश और टीकम भी बीएसए में हैं। वो भी आजकल जम्मू में ही तैनात हैं। राकेश पड़ोस के गांव भीम नगरिया का रहने वाला है। राकेश चार जनवरी को ही छुट्टी लेकर घर आया है। आने से पहले राकेश की मुलाकात देवेंद्र से दो जनवरी को जम्मू में ही हुई थी।
राकेश की मानें तो उस वक्त देवेंद्र ने राजी खुशी की खबर देते हुए घर के हालचाल लेते रहने की बात कही थी। उस वक्त राकेश को क्या पता था कि यह देवेंद्र से उसकी आखिरी मुलाकात होगी। राकेश गांव आकर देवेंद्र के घर जाने की सोच ही रहा था कि उससे पहले ही देवेंद्र के शहीद होने की खबर गांव में पहुंच गई।
राकेश का कहना है कि जब वो देवेंद्र के घर पहुंचा तो तब तक दोस्त की राजी खुशी का पैगाम बेमानी हो चुका था।
'पापा को जम्मू में गोली लग गई है'
शहीद देवेंद्र के दो बेटे हैं। पांच वर्ष का सबसे बड़ा बेटा अभिषेक गांव में ही दादा-दादी के पास ही रहता है। मंगलवार को जहां पूरा गांव शोक में डूबा हुआ था, वहीं अभिषेक अपने दोस्तों के साथ खेलने में मगन था। हां इतना जरूर था कि रोने की आवाजों को सुनकर वह घर की छत पर चला जाता और रोती हुई अपनी चाची, बुआ, दादी और दूसरे रिश्तेदारों को देखने लगता है।
लेकिन उस वक्त भी मासूम के जहन में यह सवाल नहीं आ रहा था कि यह सब क्यों रो रहे हैं। पूछने पर अभिषेक बस इतना ही बताता है कि पापा को जम्मू में गोली लग गई है। इसके बाद फिर से वो मासूम रबर के एक पहिये के साथ खेलने लगता।
अभिषेक एक महीने पहले जम्मू में अपने मां-बाप के साथ ही था। नवंबर में छुट्टी पर आए देवेंद्र उसे गांव छोड़ गए थे।
'भाई तुम तो आने की बोलकर गए थे'
देवेंद्र की छोटी बहन कुंती की शादी दिल्ली में हुई है। हालांकि सोमवार की रात ही कुंती को भाई के शहीद होने की खबर मिल गई थी। लेकिन गांव पहुंची वो मंगलवार की दोपहर। भाई की मौत पर रोते हुए कुंती बस एक ही बात बोल रही थी कि भाई आप तो मेरे घर आने की बात बोलकर गए थे।
करूंगा तो सिर्फ बेल्ट वाली नौकरी
देवेंद्र फौज में जाने के लिए बहुत उत्साहित रहते थे। गांव वालों की मानें तो वह पूरे गांव में कहता फिरता था कि नौकरी करूंगा तो सिर्फ बेल्ट वाली, वर्ना और कोई दूसरी नौकरी नहीं करूँगा। फौज की वर्दी पर बांधी गई चमचमाती बेल्ट देवेंद्र को बहुत आकर्षित करती थी। यही वजह थी कि देवेंद्र ने फौज में जाने के लिए कड़ी मेहनत की थी।
जयंत ने शहीद गेट बनवाने का दिया भरोसा
रालोद नेता जयंत चौधरी और विधायक जब गांव पहुंचे तो गांव वालों ने उनसे शहीद देवेंद्र की याद में गांव को जोड़ने वाली सड़क पर एक शहीद गेट बनवाने की मांग रखी। जिस पर जयंत ने वहां मौजूद रालोद विधायक को शहीद गेट बनवाने की बात कही।
गांव के चार और युवक हैं फौज में
गांव वालों ने बताया कि गांव के चार और युवक फौज में हैं। रामवीर सिंह सीआरपीएफ, अतुल, मोनू नेवी तो पवन आईटीबीपी में है। पवन फिलहाल छुट्टी पर घर आया हुआ है। गांव के दूसरे युवक भी हर रोज सुबह उठकर फौज में जाने की तैयारी करते हैं।
कबड्डी और क्रिकेट के शौकीन थे देवेंद्र
दोस्त गंभीर सिंह ने बताया कि देवेंद्र को कबड्डी और क्रिकेट खेलने का बेहद शौक था। जब भी छुट्टी पर आते तो सिर्फ मैच देखने के लिए ही आसपास के गांव में आठ-दस किमी तक चले जाते थे। किसी भी मैच के दौरान वह बॉलिंग बहुत अच्छी करते थे। कबड्डी में यह हाल था कि चोट लगने के बाद भी खेलते रहते थे।
जब भी आता था पूरे गांव से मिलता था
पड़ोसी ओमप्रकाश ने देवेंद्र को याद करते हुए कहा कि शुरू से ही गांव वालों का दुलारा था। ऐसा कोई वाक्य याद नहीं पड़ता कि गांव में उसकी किसी से कभी कोई कहासुनी हुई हो। यहां तक कि जब वह छुट्टी पर घर आता था तो पूरे गांव से मिलता था। छोटे लड़कों को फौज में जाने के लिए उत्साहित करता था।
गांव ने पहली बार झेला है दर्द
फौज से रिटायर पड़ोसी चरन सिंह ने बताया कि हमारे ही नहीं आसपास के आधा दर्जन से अधिक गांव के लड़के फौज में हैं। कोई बीएसएफ, सीआरपीएफ तो कई सेना में है। लेकिन यह पहला मौका है जब इन सभी गांव ने इस दर्द को झेला है। हमें देवेंद्र के जाने का गम है तो दुश्मन से मुकाबला करते हुए पाई शहादत पर गर्व भी है।
बस आखिरी बार हैप्पी न्यू ईयर बोला था भाई को
छोटा भाई मनोज का कहना है कि एक जनवरी को भाई को मैंने फोन किया था। लेकिन नेटवर्क की वजह से बार-बार फोन कट रहा था। फिर भाई ने खुद ही फोन किया। मैंने भाई को हैप्पी न्यू ईयर बोला। भाई हमेशा मुझे आईटीआई पूरी कर अच्छी नौकरी करने की बात कहते थे। लेकिन अब मैं फौज में जाऊंगा।
डीएम और एसएसपी पहुंचे शहीद के घर
डीएम अभिषेक प्रकाश तथा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जे. रवींद्र गौड़ ने मुहरैनी पहुंच कर जम्मू-कश्मीर में शहीद हुए देवेंद्र सिंह के पिता और परिजनों को ढांढस बंधाया। डीएम ने कहा कि इस दुखद घड़ी में जिला एवं पुलिस प्रशासन शहीद परिवार के साथ खड़ा है। परिवार को एक गैस एजेंसी दिलाने और गांव के प्रवेश द्वार पर शहीद की यादगार में स्मृति द्वार की स्थापना कराये जाने की मांग डीएम के समक्ष उठाई गई है।
डीएम ने परिजनों को ढांढस बंधाते हुए आश्वस्त किया कि उनके परिवार की हर संभव मदद की जाएगी। शहीद देवेंद्र सिंह बीएसएफ की 9वीं बटालियन में जम्मू-कश्मीर के सांबा सेक्टर की खोरा चौकी पर तैनात थे। महज 29 वर्ष की आयु में देश की रक्षा करते हुए पाकिस्तान की ओर से की गई गोलाबारी में वह शहीद हो गए। शहीद देवेंद्र सिंह अपने परिवार में दूसरे नंबर के बेटे थे, उनके पिता पोस्ट आफिस में तैनात हैं।
उनके पिता सोवरन सिंह ने कहा कि उन्हें फख्र है कि देश की रक्षा करते हुए उनका बहादुर बेटा सरहद पर शहीद हो गया है। वह पढ़ रहे अपने दूसरे बेटों को भी सेना में भेजने से कतई गुरेज नहीं करेंगे।
'धोखे से मारा मेरे पति को'
शहीद देवेंद्र की पत्नी रीता का कहना है कि हमारी सरकार को पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देना चाहिये। मंगलवार को रीता ट्रेन से पहले मथुरा और वहां से करीब सात बजे मुहरैनी पहुंची।
रीता ने बताया कि उसके पति को गोली लगने की जानकारी नर्स द्वारा सोमवार दोपहर दो बजे मिली थी। हास्पिटल में पति को देखने की जिद की तो उसको पति के पार्थिव शरीर तक ले जाया गया। उसको इस बात का मलाल है कि उसके पति को पाकिस्तानी सेना द्वारा धोखेसे क्षदम युद्ध में मारा गया है। बीएसएफ सीओ की पत्नी तथा अन्य अधिकारियों की पत्नियां उसके पास सांत्वना देने आई थी। बार्डर पर अघोषित युद्ध जैसे हालात हैं लोगों में भय बना रहता है कि कब गोलाबारी हो जाये, कब फायरिंग हो जाये। शहीद का पार्थिव शरीर घर भेजा जाता है लेकिन परिवार को उसके हाल पर छोड़ दिया जाता है। बीएसएफ को इस बारे में सोचना चाहिए। उसको सांबा सेक्टर से रेलवे स्टेशन तक छोड़ दिया गया था।
इसके बाद मथुरा तक वह हैडक्वार्टर में रहने वाली टीना पत्नी नंदकिशोर के साथ आई और वहां से गाड़ी से गांव तक पहुंची। सेना ने 31 दिसंबर को चार पाकिस्तानी सैनिकों को मार दिया था, इसके बाद से लगातार फायरिंग हो रही है। टीना ने बताया कि पाकिस्तान की ओर से भारतीय सीमा पर लगातार फायरिंग व गोलाबारी की जा रही है जिसमें पशु-पक्षी तक हताहत हो रहे हैं। बार्डर पर रात के समय सेना मकान तक खाली करा दिया जाता है।
आज होगा अंतिम संस्कार
शहीद देवेंद्र के भाई धर्मेन्द्र का कहना है कि देवेंद्र के पार्थिव शरीर को दिल्ली तक वायुयान से लाया गया है तथा दिल्ली से मथुरा सड़क मार्ग से सेना की गाड़ी में लाया जा रहा है। देर रात्रि में पार्थिव शरीर को कोतवाली में लाया जाएगा। कोतवाली से गांव में लाकर सुबह राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जायेगा।
असम में शहीद हुए सूबेदार रामेश्वर का शव घर पहुंचा
पांच दिन से मेरठ के कंकरखेड़ा में परिवार को ढांढस बंधा रहे पिता परमानंद भी शहीद बेटे का शव देखकर फफक पड़े। बेटे की इस शहादत पर गौरव महसूस कर रहे परमानंद लाख चाहने के बाद भी अपने आंसू नहीं रोक पा रहे थे। मंगलवार सुबह करीब 10 बजे जब उनका शव कृष्णा कालोनी लाया गया। इस गमगीन माहौल में पहले तो शहीद का ताबूत खोलने की कोई हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहा था।
बाद में जैसे ही सैन्य अधिकारियों ने ताबूत खोला, परिवार ही नहीं वहां मौजूद हर शख्स शहीद सूबेदार रामेश्वर प्रसाद का शव देखकर रो पड़ा। शहीद की पत्नी और बेटी तो बेहोश हो गईं। जैसे तैसे परिजनों को संभालकर विधि विधान और सम्मान के साथ अंतिम यात्रा निकाली गई। यात्रा में कालोनी के सैकड़ों लोग शामिल हुए। महिलाओं और बच्चों ने छतों से शहीद पर फूल बरसाए।
रोहटा रोड कृष्णा कालोनी निवासी सूबेदार रामेश्वर प्रसाद (52) पुत्र परमानंद मूल रूप से गढ़वाल पौढ़ी जिले के गांव मैथना के रहने वाले थे। करीब 15 सालों से यहां आकर रह रहे थे। 2 जनवरी की रात को असम में बोडो उग्रवादी संगठन के साथ हुई मुठभेड़ में वो शहीद हो गए थे।
शहीद को तिरंगे में लपेटकर दिया गार्ड ऑफ ऑनर
मंगलवार को सैन्य अधिकारियों और प्रशासनिक अफसरों की मौजूदगी में सम्मान के साथ शव घर लाया गया। शव देखते ही शहीद के पिता परमानंद ही नहीं शहीद के दोनों बेटे भास्कर, सुनील और बेटी सरिता दहाड़ें मारकर रोने लगे।
बाद में शहीद के शव को तिरंगे में लपेटकर गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। शहीद के दोनों बेटों और फौजियों ने अर्थी को कंधा दिया। इसके बाद वंदे मातरम और भारत माता की जय के जयकारों के साथ शव को सड़क पर खड़ी फौज की गाड़ी तक पहुंचाया गया। इस शहीद के सम्मान में उधर से निकल रहा हर व्यक्ति रुक गया। वो चाहे पैदल हो या गाड़ी से। शहीद के प्रति यह सम्मान देखकर घर वाले भी गौरव महसूस करते हुए नारे लगाने लगे।
विधायक को सुनाई खरी खोटी, सांसद पर भी भड़के
इस दौरान कालोनी के लोगों ने भाजपा कैंट विधायक सत्य प्रकाश अग्रवाल को खूब खरी खोटी सुनाई। कहा कि वैसे तो कार्यक्रमों में बहुत जल्दी पहुंच जाते हैं, लेकिन शहीद के परिजनों को सांत्वना देने नहीं आ सके। लोगों की नाराजगी देखकर विधायक वहां से चलते बने। वहीं सांसद के न पहुंचने पर भी लोगों ने रोष जताया।