अहमदाबाद के तीस वर्षीय नौजवान मुकेश वाघेला मानते हैं कि अब उनके पास सिर्फ 10 साल और बचे हैं ज़िंदा रहने के लिए।
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वहीं 36 साल के भरतभाई मकवाना मानते हैं कि उनके पास करीब पाँच से छह साल हैं ज़िन्दगी के और उनकी पत्नी नैनबेन के पास शायद दो या तीन साल।
लेकिन नारनभाई बाबाभाई खुद को खुशनसीब मानते हैं कि वह 45 साल के हो गए हैं और चल-फिर भी रहे हैं पर उन्हें लगता है कि वह बस कुछ और महीने ही इस हालत में रह सकेंगे।
आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में गुजरात में 100 से भी अधिक सफाईकर्मी गटर साफ़ करते वक़्त या बाहर निकलने के बाद मर गए।
यह कहानी सिर्फ इन तीनों की नहीं बल्कि उस समाज के कई पुरुषों और महिलाओं की भी है जो आज़ाद भारत में खुद को आज भी कैद मानते हैं और लड़ने के बजाए अन्याय और भेदभाव को अपनी किस्मत मान कर जीते जा रहे हैं। पर ऐसा क्यों और कब तक?
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'पिताजी 40 पर मर गए और मैं भी..'
मुकेश वाघेला गुजरात में मैला ढोने वाले हज़ारों लोगों में से एक हैं। अपने पिता से उनका वेतन दोगुना है और वह बाइक के साथ स्मार्टफोन लेकर काम पर जाते हैं।
वे कहते हैं, "लेकिन ज़िन्दगी 40 तक की है। हमारी बस्ती में ज़्यादातर लोग 40-45 के होते ही मर जाते हैं। मेरे पिताजी भी 40 की उम्र में मर गए। मैं मैला उठाने और गटर साफ़ करने का काम करता हूं। जब गटर से बाहर निकलता हूं तो खुद के शरीर से घिन आती है और फिर शराब पीकर सो जाता हूं।"
मुकेश के साथ ही काम करने वाले नारनभाई ने अपने पिता और दो रिश्तेदारों को खो दिया। तब वे 50 की उम्र तक पहुंचे ही थे।
नारनभाई कहते हैं, "मुझे और मैला ढोने वाले सभी लोगों को पता है कि हमें जल्द ही अस्थमा, टीबी और अन्य बीमारियां होंगी। पर अब यही परंपरा है कि वाल्मीकि समाज के लोग सबका मैला साफ़ करेंगे।"
'यह नरक है'
नारनभाई अहमदाबाद के चामुंडा ब्रिज के पास बीते दस वर्ष से लोगों का मैला साफ़ कर रहे हैं।
अकेले अहमदाबाद में ही 200 से अधिक ऐसी जगह हैं जहां लोग खुले में शौच करते हैं।
नारनभाई बताते हैं, "जब मैं कहता हूं कि कृपया रास्ते पर शौच न करें क्योंकि उसे साफ़ करने में आधा दिन निकल जाता है तो लोग कहते हैं कि यहां नहीं तो क्या तुम्हारे घर आए। शायद उनकी भी मजबूरी है, 500 लोगों के बीच एक शौचालय हो तो वह कर भी क्या सकते हैं।"
इसी तरह विमलाबेन भी अपने पति के साथ मैला उठाने का काम करती हैं।
वे कहती हैं, "यह नरक है। पर ऐसा ही चलेगा हम वाल्मीकि समाज से हैं। हमारे पास डिग्री हो या पैसा हमें यही काम करना पड़ेगा। यही काम हमारे बच्चे करेंगे। यही परंपरा है।"
बच्चों से क्यां कहूं
भरतभाई कहते हैं, "बच्चे जानते हैं कि उनके मां-बाप सफाई कर्मचारी हैं लेकिन हमने उन्हें कभी नहीं बताना चाहा कि हम लोग मैला उठाने का काम करते हैं। यह तो नरक जैसा है। उन्हें पढ़ा-लिखाकर इंजीनियर बनाना चाहता हूं।"
वे कहते हैं, "चिंता यह है कि शायद इंजीनियर बनने के बाद भी उन्हें कोई नौकरी नहीं देगा तो वह भी यही काम करेंगे और अपने बच्चों से छुपाएंगे।"
भरतभाई पिछले 10-12 साल से अहमदाबाद के पूर्वी हिस्से की एक बस्ती में लोगों का मैला साफ़ कर रहे हैं।
वह कहते हैं, "घर जाने से पहले यह बस्ती वाले मुझे हाथ धोने को पानी भी नहीं देते पर बच्चों को बदबू न आए इसलिए पास के एक सरकारी ऑफिस में जाकर हाथ-मुंह धो लेता हूं।"
वहीं अहमदाबाद के एक पॉश इलाके के नज़दीक एक बस्ती से मैला उठाने वाली विमलाबेन कहती हैं, "पहले तो हाथों से ही साफ करते थे अब किसी और चीज़ से करते हैं। सरकार ने कुछ लोगों को दस्ताने और जूते दिए हैं पर वह जिनके पास हैं, वह लोग अब यह काम नहीं करते।"
वे बताती हैं, "कुछ लोग हमें हरिजन कहते हैं कुछ वाल्मीकि कहकर बुलाते हैं लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है। काम तो दादाओं के ज़माने से हम एक ही कर रहे हैं।"
आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में गुजरात में 100 से भी अधिक सफाईकर्मी गटर साफ़ करते वक़्त या बाहर निकलने के बाद मर गए।
सुरेशभाई वाघेला कहते हैं, "शरीर से तो दुर्गन्ध चली जाती है पर ज़ेहन से बदबू और वह दृश्य नहीं जाता। इसलिए मैला उठाने वाले अधिकतर लोग ख़ासकर मैनहोल साफ़ करने वाले शराब पीकर ही काम करते हैं।"
सुरेशभाई महिला सफाईकर्मियों के सशक्तिकरण के लिए भी काम करते हैं।
गुजरात में सफाई कर्मचारी छठा वेतन आयोग लागू होने के बाद हर महीने लगभग 18,000 रुपये कमाते हैं लेकिन 30 प्रतिशत लोग आज भी सफाई का काम कॉन्ट्रैक्ट पर कर रहे हैं और महीने के सिर्फ दो-ढ़ाई हज़ार रुपये कमा पाते हैं।